Monday, April 7, 2014

मानो मत, जानोः “राम के नाम” ...साधो, देखो जग बौराना


हॉली और बॉली वुडों ने दावा किया कि दुनिया बस वही है जो उन्होंने दिखाई... बहुत बड़ा झूठ बोला, क्योंकि दुनिया तो वह नहीं है। दुनिया का सच तो हिलाने, हैराने, हड़बड़ाने और होश में लाने वाला है, और उसे दस्तावेज़ किया तो सिर्फ डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों ने। “मानो मत, जानो” ऐसी ही एक श्रंखला है जिसमें भारत व विश्व की अऩूठे धरातल वाली अविश्वसनीय, परिवर्तनकारी डॉक्युमेंट्रीज पढ़ व देख सकेंगे।

 Documentary. .In The Name Of God (1992), directed by Anand Patwardhan.

हरित भूमि तृण संकुल समुझि परहिं नहीं पंथ
जिमि पाखंड विवाद ते लुप्त होहिं सदग्रंथ...
"जब घोर बरसात होती है तो इतनी घास उग जाती है कि जो सही रास्ते हैं वो दिखाई नहीं पड़ते। उसी तरह से कि पाखंडियों की बात से सही बात छिप जाती है। जैसे किसी आदमी ने खा लिया कोई नशा। नशा जब तक उसके शरीर में रहेगा, तब तक कोई भी क्रिया वो कर सकता है। पागल भी हो सकता है, हमला भी कर सकता है, स्वयं की हत्या कर सकता है। ये सब उन्माद होते हैं। विचार, चिंतन, सब नष्ट हो जाते हैं। लेकिन ये वर्षा ऋतु थोड़ी ही देर के लिए होती है। बाद में लोगों की समझने की, सोचने की क्षमता लौटती है। आज जो लोगों में ये बातें हैं वो उन्माद है और जब असलियत सामने आ जाएगी, जब लोग जान जाएंगे कि हां ये बात गलत कही गई, हम लोगों को गुमराह किया गया, तो अपने ही लोग उनका बहिष्कार कर देंगे। मैं बहुत दुख महसूस करता हूं। तब भी अपना उतना ही संयम, उतना ही धैर्य बनाए रखा है। तूफान है, लेकिन उस तूफान से हमें विचलित नहीं होना चाहिए। ये भाटे (लहर) की तरह आया और गया।"
- लालदास जी, विवादास्पद रामजन्मभूमि मंदिर के तत्कालीन पुजारी, अरण्य कांड का दोहा उद्धरित करते हुए, डॉक्युमेंट्री बनने के एक साल बाद उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई...

देश के मौजूदा हाल में आनंद पटवर्धन की 1991 में, बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से एक साल पहले बना ली गई ये डॉक्युमेंट्री बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। 2014 के आम चुनाव होने वाले हैं। ऐसा प्रचारित किया जा रहा है कि उसी दल की सरकार आएगी जिसने देश में हिंदुओं-मुस्लिमों के बीच वर्षों से कायम प्रेम को नष्ट किया, अयोध्या में राम मंदिर बनाने की धर्मांधता पूरे मुल्क में फैलाई, दंगों को जन्म दिया, हजारों-हजार निर्दोष नागरिकों की हत्या करवाई। संबंधित दल के भाषणों, निराश करने वाले रवैये और उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोर सांप्रदायिक छवि ने समाज के कई तबकों में डर भर दिया है। डरने की बात भी है। आनंद “राम के नाम” में उस भय का चेहरा करीब से दिखाते हैं। आश्चर्य की बात है, भारत में सीमित लोगों ने इस बेहद जरूरी फ़िल्म को देखा है। इसे बड़ी आसानी से अपने विषय, फुटेज और कालखंड के लिए सर्वकालिक महान दस्तावेज़ों में गिना जा सकता है।

Ram Ke Naam
इसकी शुरुआत नारों से होती है। “मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के मंदिर का निर्माण”, “इफ देयर इज नो राम… देयर इज नो सरवाइवल”, “सौगंध राम की खाते हैं... हम मंदिर वहीं बनाएंगे” और “बच्चा-बच्चा राम का... रामभूमि के काम का”। नारे, जो 1990 में एक सोचे-समझे राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए भारत की सड़कों पर उगा दिए गए। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता लालकृष्ण आडवाणी रथ के आकार में बनी आरामदायक टोयोटा में 10,000 किलोमीटर लंबी यात्रा पर निकले। इरादा अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाना जो उनके मुताबिक भगवान राम का जन्मस्थल था। राम जो भारत में जन्मे मर्यादावान और आदर्श राजा थे। वे तत्कालीन या समकालीन वक्त में जिंदा होते तो इस पाखंड का विरोध करते। खैर, नारों के बीच सड़क के किनारे मोटरसाइकिल पर अंग्रेजी बोलता व्यक्ति रुकता है। फैशनेबल ऐनक लगाए वह पूरे यकीन के साथ कैमरे के आगे हिंदु होने के मायनों पर बोलता है। ऑयल बिजनेस करता है। पूरी फ़िल्म के दौरान आनंद लोगों से उनकी जाति और पेशा पूछते चलते हैं ताकि मतिभ्रष्ट और सद्बुद्धि वाले लोगों की पृष्ठभूमि का अंदाजा रह सके।

इस मसले का आधार जल्दी से रख दिया जाता है। बताया जाता है, “बाबरी मस्जिद का निर्माण अयोध्या में सन 1528 में हुआ। उसके तकरीबन 50 साल बाद तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ लिखकर रामकथा को आम लोगों तक पहुंचाया। 19वीं सदी तक अयोध्या नगरी राम मंदिरों से भर गई। इनमें से कई मंदिरों का ये दावा रहा कि राम यहीं जन्मे हैं। इस समय तक अंग्रेज़ों के पैर भारत में जम चुके थे पर वे हिंदु-मुस्लिम भाइचारे से अपना तख़्ता पलट जाने का ख़तरा महसूस करते थे। शायद इसीलिए अंग्रेज़ इस अफवाह को हवा देने लगे कि मुग़ल शहंशाह बाबर ने बाबरी मस्जिद का निर्माण रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़कर किया था। आपसी तनाव के बावजूद हिंदु मस्जिद के प्रांगण में राम-चबूतरे पर पूजा करते रहे, जबकि मुसलमान मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ते रहे। इस समझौते का अंत 1949 में हुआ जब कुछ हिंदुओं ने मस्जिद में घुसपैठ कर राम-मूर्तियां रख दीं। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के. के. नय्यर ने दंगा-फसाद की आशंका जाहिर करते हुए मूर्तियों को वहां से हटाने से इनकार कर दिया। बाद में वे जनसंघ में शामिल हो गए और संसद सदस्य भी बने। मस्जिद को सील बंद कर मामला कोर्ट में दर्ज कर दिया गया। कोर्ट ने पुजारी नियुक्त किए और हिंदु मस्जिद के बाहर पूजा करने लगे। आज हिंदु कट्टरपंथी कसम खा रहे हैं कि कोर्ट का फैसला जो भी हो, वे मस्जिद की जगह एक भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे। दुनिया भर से राम शिलाएं और चंदा इकट्ठा हो रहा है...”

...आगे विश्व हिंदु परिषद् का वीडियो आता है जिसे लोग खड़े बकरियों की तरह देख रहे हैं। स्थानीय वीडियो में अभिनय और फ़िल्ममेकिंग के जरिए छद्म-प्रचार दिखता है। इसमें भक्त रूपी एक व्यक्ति कहता है, “23 दिसंबर की रात मैंने देखा कि बाबरी मस्जिद में यकायक चांदनी सी फूटी... और उस तेज रोशनी में मैंने देखा... कि एक 4-5 साल का बेहद खूबसूरत लड़का (कृष्ण/राम) खड़ा है। जब बेहोशी टूटी तो मैंने देखा कि सदर दरवाजे का ताला टूटकर जमीन पर पड़ा था। सिंहासन पर बुत (मूर्ति) रखा हुआ था और लोग आरती उतार रहे थे...” ये कैसेट चल रही है और भी दावे हो रहे हैं कि दरअसल भगवान कब और कैसे जन्मे थे, व सामने भीड़ में खड़ा एक 16-17 साल का लड़का भावुक होकर रो रहा है।

अयोध्या और आसपास के मुस्लिम निवासियों में भय व्याप्त है। अवाकपन है। बाबरी में नमाज पढ़ने जाने वाले मूर्ति रखने की घटना के पीछे की साजिश बताते हैं। एक बुजुर्ग कहते हैं, “आज यतनी नफरत पैदा कर दी गई है कि ज़नाब हमारी सूरत से लोग बेज़ार हैं”। दंगों में आगे 2500 से ज्यादा लोगों की जानें जाती हैं। वे बुजुर्ग फ़िल्म के आखिर में बेहद विकल होकर बोलते हैं, “कल क्या होगा? कल ये होगा कि हमारी मौत होगी!” साथ खड़े मुस्लिम सज्जन बोल पड़ते हैं, “देखिए जयपुर को फूंक दिया, सारा भारत हमरा जल रहा है इसी एक प्रॉब्लम पे। पहले कोई सोच नहीं सकता था कि हमारे-आपके ताल्लुकात में कोई फर्क आएगा। लेकिन आज माहौल ऐसा कर दिया गया है कि हम एक-दूसरे से भय कर रहे हैं, डर रहे हैं। बोलते हुए घबराता है आदमी, बात करते हुए घबराता है, मिलते हुए घबराता है। ऐसी भावना खराब कर दी गई है इस हिंदुस्तान की कि साहब कोई जवाब ही नहीं मिलता है। परिक्रमा करने तो तमाम मुसलमान जाते थे शौकिया। कुछ यारी दोस्ती में। कि भैया क्या फर्क पड़ता है! परिक्रमा करने वालों को पानी पिलाते थे। ...धार्मिक मामला ऐसा होता है कि हम-तुम एक थाली में बैठकर खाएं। लेकिन जहां मामला आया बाबरी मस्जिद-राम मंदिर का, तुनक कर आप उधर खड़ी हो गईं, मैं इधर खड़ा हो गया। न आप बहन रही न मैं भाई रहा (महिला साक्षात्कारकर्ता को संबोधित करते हुए)”। वहां बैठे एक अन्य व्यक्ति कहते हैं कि उनके गांव में हिंदु-मुसलमान जैसी कोई बात नहीं है। वे कहते हैं, “मेरे यहां शादी होती है हम परसते हैं वो खाते हैं, उनके यहां होती है वो परसते हैं हम खाते हैं। अयोध्या के 10-15 किलोमीटर के दायरे में जितने गांव हैं वहां कोई दिक्कत नहीं है। जब तक बाहरी सांप्रदायिक तत्व नहीं आते सब ठीक है, वो आ जाएंगे तो झगड़ा होना ही होना है”।

आगे हम लालदास जी से मिलते हैं जो विवादास्पद रामजन्मभूमि मंदिर के कोर्ट नियुक्त पुजारी हैं। विश्व हिंदु परिषद् के मंदिर बनाने के कार्य पर कहते हैं, “ये तो एक राजनीतिक मुद्दा है। विश्व हिंदु परिषद् ने कार्यक्रम चलाया है, ... पर मंदिर तो बनाने के लिए कोई रोक नहीं थी। हमारे यहां ऐसा कोई विधान नहीं है कि भगवान को किसी अलग जगह हटाकर रखा जाए क्योंकि भगवान जहां विराजमान होते हैं हम उसे मंदिर ही मानते हैं। चाहे वो किसी मकान में रख दिए जाएं तब भी हम उसको मंदिर ही कहते हैं। फिर अलग से मंदिर बनाने का कोई औचित्य नहीं होता है। अलग से बनाया भी जाता है तो उस इमारत में जहां भगवान विराजमान हैं। हम उसको तोड़ना भी नहीं चाहते हैं। और जो लोग तोड़ना चाहते हैं वो इसलिए कि पूरे हिंदुस्तान में तनाव की स्थिति पैदा हो, और हिंदु मत हमारे पक्ष में हो। उनको ये चिंता नहीं है कि कितना बड़ा जनसंहार होगा, कितने लोग मारे जाएंगे, कितने कटेंगे, कितनी बर्बादियां होंगी। या जो मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में हिंदु रहते हैं उनकी क्या परिस्थिति होगी। हमारे देश के सामने तमाम ऐसी समस्याएं हैं। 1949 से आज तक किसी मुसलमान ने वहां कोई अवरोध नहीं पैदा किया। लेकिन जब इन्होंने ये नारा दिया कि ‘बाबर की संतानों से खून का बदला लेना है...’ तब पूरा देश जो है वो दंगाग्रस्त हो गया और कम से कम हजारों लोग इसमें मारे गए ...मौत के घाट उतार दिए गए। लेकिन तब भी इन लोगों ने ये जरा भी महसूस नहीं किया कि ये तनाव जो फैल रहा है, हिंदु-मुस्लिम की एकता जो हमारे देश में बनी हुई थी... तमाम मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को जो जागीरें दीं ... आज जानकी घाट में माफीनामा मिला, हनुमान गढ़ी के बहुत से भाग मुसलमानों के बनाए हुए हैं, फकीरी रामजी का मंदिर मुसलमानों का माफीनामा है। ये तमाम जागीरें जो हैं, मुसलमान शासकों द्वारा मंदिरों में दी गईं। और अमीर अली और बाबा रामचरण दास के जो समझौते थे कि हम हिंदु और मुसलमान दोनों एक मिलकर के रहेंगे, उसी जन्मभूमि के हिस्से के दो भाग किए गए कि एक तरफ मुसलमान नमाज पढ़ेंगे, दूसरी तरफ हिंदु पूजा करेंगे। ये सारी बातें जो थी उस पर इन लोगों ने पानी फेर दिया”।

आगे राम के नाम पर क़त्ल-ए-आम करने को जगाए जा रहे ख़ौफ़नाक चेहरे खड़े दिखते हैं, ख़ौफ़नाक सोच नजर आती है। एक व्यक्ति तलवार लेकर खड़ा है। इलैक्ट्रिशियन है। साथ में भगवा वस्त्र धरे कई अन्य खड़े हैं। सब इतने आश्वस्त हैं जैसे उन्हें इतिहास की पूरी जानकारी है। वे जानते हैं वे क्या करने जा रहे हैं। जबकि उन्हें कोई अंदाजा भी नहीं है कि ‘मैन्यूफैक्चरिंग कंसेंट’ क्या होता है। आज 2014 में भी नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी तक आते-आते इस मामले में तरक्की ज्यादा नहीं हुई है। खैर, फ़िल्मकार इन हथियार धारियों से पूछते हैं, रामजी का जन्म कब हुआ था? तो कोई जवाब नहीं दे पाता। वो तलवार लेकर खड़ा बिजली वाला भी नहीं। वो लॉ का फर्स्ट ईयर स्टूडेंट भी नहीं जिसके हाथ में भारतीय जनता पार्टी का झंडा है, और आंखों पर आधुनिकता की निशानी काला चश्मा है। कैमरा आगे बढ़ता है, एक बुजुर्ग से लगने वाले पुजारी से पूछते हैं, राम का जन्म कब हुआ था? उसे भी नहीं पता... बस इतना पता है कि हजारों साल पहले। कोई कहता है लाखों साल पहले तो उसकी बात काटकर कहता है, “नहीं-नहीं, हजारों साल पहले”। गाड़ी के अंदर से उतर रहे एक अन्य सीनियर पुजारी कहते हैं, “द्वापर युग में हुआ था”। सुनकर लगता है, क्या रक्तपात करने के लिए ये दो पंक्तियां काफी हैं? माहौल के अन्य दृश्य दिखते हैं। पेड़ों पर एक ही तरह के झंडे लगे हैं। देखकर लगता है, ये एक ही धर्म के लोगों का देश है।

इस दौरान जब ऊंची जातियों के लोग (सभी नहीं) मंडल आयोग के फैसलों से नाराज हैं, शोषित वर्गों में नई जागरूकता उभर रही है, ऐसा बताया जाता है। हम भवानीदेवी से मिलते हैं। वे गौमतीनगर में रहती हैं। सिलाई का काम करती हैं। उनकी कपड़े की दुकान है। पहली बार कैमरे के सामने बोलने की थोड़ी झिझक है, पर पवित्र भाव लिए कहती हैं, “मजूरी खेती-बाड़ी करते थे। खेती-बाड़ी करते थे उनकी जो मंदिर में बैठते हैं, पूजा करते हैं। काट-बीटकर करते थे तो वो खाते थे, लेकिन गल्ला आ जाता था तो कहते थे तुम अछूत हो, हमारे घर में कदम नहीं रखना है। उसके बाद हम लुटिया छूना चाहेंगे तो छूने नहीं देंगे। हमारे बुजुर्गों की भी यही हालत थी। इन्हीं लोगों ने, मंदिर के पुजारियों ने उन्हें सताया है”। आश्चर्य की बात ये होती है कि इस सामूहिक पागलपन के दौर में सिर्फ नीची जाति के, पिछड़े और वंचित तबके के लोग ही हैं जो भाइचारे की बात करते हैं। रथयात्रा जिस रास्ते से निकलने वाली है, उसके किनारे किसी गांव में कोई व्यक्ति खड़े हैं। पूछने पर कहते हैं, “न जाने मंदिर कब बना? जो 40 साल से है तो अब क्यों तोड़ दिया जाए! वो भी देवता है, वो भी देवता। मुस्लिम भाई नमाज पढ़े, वो पूजा करे। अब बिगाड़ने से कोई नहीं होने वाला है”। आनंद की आवाज पूछती है, आप कौन सी जाति से हैं? वह कहते हैं, “हम रैदास...” फिर रत्ती भर रूक कर कहते हैं, “चमार जिसको कहते हैं, वही हैं”। उन्हें सुनकर श्रद्धा पैदा होती है।

इसी तरह पटना में लोग इस सांप्रदायिकता के खिलाफ एकजुट हुए। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सम्मानित और समझदार नेता ए. बी. बर्धन मंच से बोल रहे हैं। सधी आवाज में, सही मुद्दों को उठाते हुए, रथयात्रा पर लगे कमल के राजनीतिक चिन्ह पर सवाल उठाते हुए। इस डॉक्युमेंट्री में सुनाई देने वाली एक और बेहद सुलझी हुई आवाज। वे रैली में आए अनेक लोगों को संबोधित करते हैं, जो आज भी कारगर है। लोग सुन रहे हैं, “अगले चुनाव में 88 से 188 कैसे हों, ये करने के लिए पूरे देश में बीजेपी का झंडा लहराते हुए वे घूम रहे हैं। मंदिर बनाएंगे और मस्जिद तोड़कर बनाएंगे! यही राम की मर्यादा है? माना कि ये उनकी अस्मिता का सवाल है। लेकिन कोई आडवाणी या कोई और कह दे कि अयोध्या का वो कौन सा कोना है जो राम की याद से पवित्र नहीं। बेशक अयोध्या में बनाएं, भव्य बनाएं मगर ये हठ न करें कि मस्जिद तोड़कर बनाएंगे। हम चाहे लाल झंडे वाले हैं या कोई और लेकिन एक धर्म की आस्था के लिए दूसरे धर्म की नहीं तोड़ सकते!”

यहां से हम दूसरे मंच की ओर बढ़ते हैं, जहां नारा लग रहा है “देशद्रोहियों सावधान, जाग उठा राम भगवान”। मंच पर प्रमोद महाजन, शत्रुघ्न सिन्हा, लालकृष्ण आडवाणी और गोपीनाथ मुंडे खड़े हैं। आज बेहद शांत, सौम्य, पाक़-साफ नजर आने वाले आडवाणी यहां गरजते हैं, “अदालत थोड़े ही तय करेगी कि रामलला का जन्म कहां हुआ था। आप तो बस रास्ते में मत आओ”। उन्हें सुनते हुए लगता है कि उन्होंने और उनके दल ने धर्म के नाम पर इतने वर्षों में लोगों को कितना बरगलाया है। इन गर्जनाओं का असर भी होता है। खबरों में देश में फैले तनाव की जानकारी मिलती है। एक अख़बार में शीर्षक होता है, “बंद के दौरान हिंसा में 30 मरे”। अलग-अलग बुलेटिन में सुनाई पड़ता है, “जयपुर में आर्मी बुलानी पड़ी। गुजरात में बीजेपी और वीएचपी के एक दिन के बंद में 8 लोग मारे गए। राजस्थान में 49 लोगों के मरने की ख़बर”।

एक दीवार पर नारा लिखा दिखता है, “30 अक्टूबर को अयोध्या चलो”। इससे उलट, कहीं, सड़क के किनारे खड़े तीन-चार ग्रामीण बातें कर रहे हैं। समाज के सबसे निचले तबके के हैं। अद्भुत बातें हैं। कह रहे हैं, “हम तो कहें कि फैसला हो। वो अपना मस्जिद बनाएं, हम अपना मंदिर बनाएं। कोई बिसेस बात नहीं। अब दोनों पक्षों में इतनी लड़ाई होगी, नुकसान ही होगा, फायदा कोई नहीं होगा। अब कहीं लड़ाई कोई हो तो पैसा लगे। इधर से पैसा, उधर से पैसा। किसी का कोई घाटा नहीं बस हम लोगों का घाटा है। चौराहे पर दुकान खोलें तो कोई एक पैसे का काम न हो। बस हमार लोगों का गल्ला सस्ता है और सब महंगाई है...”। फ़िल्मकार उन्हें टटोलता है कि क्या यहां भी दोनों संप्रदायों में झगड़ा होता है। वे कहते हैं, “हमरे यहां कोई ऐसी बात नहीं है। कभी झगड़ा नहीं हुआ। ये तो बाहर-बाहर का है सब...”। तभी फ्रेम में एक अन्य सज्जन आते हैं। आर्थिक रूप से थोड़े बेहतर लगते हैं। बोलते हैं, “ये सब बेकार की बातें हैं। अब मस्जिद तोड़ के मंदिर कैसे बने? अब बगल में बना लिया, ब कोई बात नहीं झगड़ा शांत करें। लेकिन अब एक उठाव (लड़ाई) वाली बात है”। आनंद पूछते हैं, आप हिंदु हैं कि कौन हैं? वे कहते हैं, “नहीं हम तो हिंदु हैं”। आनंद फिर पूछते हैं, तब भी आप सोचते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए? वे कहते हैं, “बिलकुल। भई, अब हमारे मंदिर कोई तोड़े लागे तो कैसे बात जमे। अगर तुम्हें मस्जिद बनाना है तो अलग बना ल्यो। या जिसे भी लोगों को मंदिर बनाना है तो अलग बना ल्यें दूर, मस्जिद न तोड़ें। जिससे एक चीज बनी है तो तोड़ना नहीं चाहिए”। अन्य दो-तीन सज्जन पहले बात कर रहे थे वे विश्वकर्मा जाति से हैं। लौहार। आनंद पूछते हैं, तो आप लोगों में से ब्राह्मण-राजपूत तो कोई नहीं है? वे सज्जन कहते हैं, “नहीं ब्राह्मण कोई नहीं है। ब्राह्मण लोग तो चाहते हैं कि मस्जिद टूट के मंदिर बन जाए। सीधा मामला उनका यही है”।

एक और सुबह का सामना होता है। अयोध्या में। एक छत पर महंत भोलादास बैठे हैं। सरल, स्पष्ट, निष्कपट। बताते हैं कि 35 साल से एक मंदिर में पुजारी हैं। फ़िल्मकार पूछते हैं, ये जो हो रहा है उसके बारे में क्या सोचते हैं? भोलादास जी बताते हैं, “पहले तो बहुत बढ़िया अयोध्या था। कोई बवाल नहीं था, कोई प्रपंच नहीं था। भगवान की नगरी एकदम शांत स्वभाव था। अब तो बवाल ही बवाल, बवाल ही बवाल चलता है”। अगला सवाल होता है, यहां पे मंदिर बहुत सारे हैं न? वे कहते हैं, “बहुत सारे हैं। कोई 5000 थे पुराने जमाने में। अब घर-घर में लोगों ने बना लिए है”। फिर फ़िल्मकार पूछते हैं, मस्जिद भी बहुत हैं? वे बोलते हैं, “हां बहुत हैं। अंग्रेजों के जमाने में कई मुसलमान थे पर कोई बवाल नहीं था। एक जमींदार थे अच्छन मियां। ये अमावा कोठी है, ये सब मुसलमानों की ही थी। ये मणि पर्वत है जो कब्र ही कब्र है। वहां कोतवाली के पीछे मस्जिद भी हैं वहां। कब्र भी है। कोई बवाल नहीं था। कौनों प्रपंच नहीं था। ये तो रामजन्मभूमि के मुद्दे पे ही शुरू हुआ। वो नय्यर साहब रहे, तभी। पहले कहां बवाल रहे। ...अब भगवान जन्म लिया था, अभी ये नहीं मालूम कि ये घर में लिया था कि उस घर में लिया कि वहां पर लिया कि वहां पर लिया। भगवान अयोध्या में जनम लिया। अब ये कैसे कहो कि उस मस्जिद में ही जनम लिया?” उनकी बातें भी कुछ राहत देती हैं।

फिर लालदास जी पर लौटते हैं। वे कह रहे हैं, “आज तक जो पूरे हिंदुस्तान में दंगे फैलाए गए, कुर्सी और पैसे के लिए फैलाए गए, न कि रामजन्मभूमि के लिए। मैं रामजन्मभूमि मंदिर का पुजारी हूं और बिलकुल सत्य कह रहा हूं कि आज तक विश्व हिंदु परिषद् के लोगों ने वहां पर एक माला भी नहीं चढ़ाई है। भगवान की पूजा-अर्चना तक नहीं करवाई है। बल्कि उन्होंने व्यवधान डाला है। हमने हाईकोर्ट में रिट डाला और उससे भोग की व्यवस्था चालू करवाई। तो यहां के जनमानस ने इसको कभी स्वीकार नहीं किया। लेकिन कुछ किराए के साधु जिनको पैसा चाहिए, पैसे पर खरीदे गए। राम शिलाएं घुमाई गईं। उन रामशिलाओं को उन्होंने अपना कमरा अपना मकान बनाना शुरू कर दिया। काफी जनभावनाओं को उन्होंने दोहन करके और बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें तैयार कर लीं। करोड़ों-अरबों रुपया इन लोगों ने इकट्ठा किया। विभिन्न बैंकों में डाला। तो लोगों की हत्याएं हो जाएं, लोग नष्ट हो जाएं, इससे इनको कोई मतलब नहीं। इनको मतलब पैसा मिले, कुर्सी मिले। यहां जो लोग हिंदु राष्ट्र की बात करते हैं, राम के नाम पर तनाव फैलाते हैं, हिंसा करते हैं, ये सभी ऊंची जाति के लोग हैं और सब के सब सुविधाभोगी हैं। इनमें त्याग और तपस्या और जनमानस का हित लेशमात्र नहीं है। ये केवल धार्मिक भावनाओं को उभार करके और केवल स्वयं को सुख-सुविधा किए हुए हैं। ये जनहित की बात कर ही नहीं सकते हैं। लेकिन आज बड़े-बड़े मठ हैं, करोड़ों-अरबों की संपत्ति उसमें है। और हम पैदल छोड़कर के एयरमेल से चलते हैं। फर्स्ट क्लास की टिकट पर चलते हैं। एयर कंडीशन के कमरे में रहते हैं। तो जहां पर हम एक तरफ भौतिकवादी व्यवस्था से अलग होकर के त्याग, तपस्या और जनहित की बात सोचते थे, उस जगह हम उसको त्यागकर पूरी तरह भौतिकवादी व्यवस्था में लिप्त हो चुके हैं तो हम भौतिकवाद की ही बात सोचेंगे। उससे परे हट नहीं सकते हैं। ...ये आज के धर्माचार्यों को आप क्या कहेंगे? मैं तो भौतिकवादी व्यवस्था का पोषक मानता हूं इन्हें। ये जो पूंजीपति कहते हैं कि हिंदु धर्म की रक्षा, हिंदु धर्म की रक्षा। अशोक सिंघल जो आज ये बात कह रहे हैं कि हम बहुत बड़े राम के भक्त हैं। क्या राम का यही आदर्श है कि 90 परसेंट लोग भूखों मरें? अगर आप बड़े पूंजीपति हैं, आपके पास पैसा है, आपके (धर्माचार्यों के) कहने में एक पूंजीपति समुदाय देश का है तो उनसे पैसा लेकर के गरीबों में लगाइए आप। जैसे मदर टैरेसा कर रही है”।

विषय जब बाहर से आ रहे चंदे और धन की राह लेता है तो हम इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर विश्व बंधु गुप्ता से मिलते हैं जिन्होंने तब विश्व हिंदु परिषद् के अकाउंट टटोलकर समन जारी किए थे। अशोक सिंघल को भी। वे बताते हैं कि ऐसा करने के 24 घंटे में वीएचपी का बड़ा प्रदर्शन प्रधानमंत्री आवास के बाहर किया गया। उसी दिन उनका मद्रास तबादला कर दिया गया। तब जो सरकार थी उसने उस जांच को दबा दिया। फिर उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। बताते हैं कि अशोक सिंघल ने कभी अपने इनकम टैक्स रिटर्न के काग़ज नहीं दिए। परिषद् के नेताओं का आपस में झगड़ा भी हुआ कि 1 करोड़ 66 लाख का जो पैसा आया वो बोगस था, उसमें लोग पैसा खा गए।

6 दिसंबर 1992 को आतंकियों ने बाबरी ढहा दी। दंगों ने पूरे देश को जकड़ लिया। हजारों मार दिए गए। वो स्टिंग ऑपरेशन तो हाल ही में आया है जिसमें बताया गया कि बाबरी विध्वंस पूर्व-नियोजित था। लेकिन इस डॉक्युमेंट्री को देखते हुए ये बात पहले ही साफ हो जाती है। सोमवार 7 अप्रैल, 2014 को यानी आज भारतीय जनता पार्टी ने फिर से अपने चुनावी घोषणापत्र में अयोध्या में इसी स्थान पर राम मंदिर बनाने का वायदा किया है। 23-24 साल पहले देश को कसाईबाड़ा बनाया गया था, वो ख़ौफ़ फिर लौट रहा है। अफसोस इस बात का है कि बहुत से लोगों ने पहले से कोई सबक नहीं लिया है। आज पहली बार वोट देने लायक हुए युवाओं में बहुत से ऐसे हैं जो उसी भाषा में बात कर रहे हैं जो नफरत भरी है। बहुत सोचने और बहुत विचारने का वक्त आ चुका है। एक गलत फैसला सभी पर बहुत भारी पड़ सकता है। सड़कें बनाने और कॉरपोरेट इमारतें खड़ी कर देने को विकास की संज्ञा नहीं दी जा सकती, ये बात समझने की जरूरत है। धार्मिक सौहार्द से समझौता किसी भी कीमत पर नहीं किया जा सकता। आज जब मीडिया 2002 के गुजरात पर बात करना बंद कर चुका है, 1992 के अयोध्या पर बात करना बंद कर चुका है, आनंद पटवर्धन व उनके साथियों की ये डॉक्युमेंट्री फ़िल्म हमारे बीच मौजूद है और अनेक वर्षों से इन बेहद गंभीर प्रश्नों को लेकर अटल खड़ी है। इसे देखने, बांटने और इससे अपनी नई समझ बनाने की जरूरत है।

आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी जहां कमजोर राजनीतिक दृष्टि के साथ चीजों को देख रही है, तो फ़िल्म से भवानी देवी याद आती हैं। उनका कहा हमारी बातों का समापन हो सकता है। वे कहती हैं, “मंदिर के अंदर हमें जाने ही नहीं दिया जाता है तो मंदिर से हमें क्या लाभ है? मंदिर की मूर्ति एक बार पिस जाए तो दोबारा मसाले से काढ़ करके बना सकते हैं लेकिन हमारी जनता कट जाए तो हम किसी प्रकार का मसाला उसमें नहीं लगा सकते। देखिए हमारी बस्ती बहुत से लोगों की जन्मभूमि हुई है उनको यहां से निकाला जा रहा है। अभी यही गांव में करीब-करीब 150 बस्ती है, उनका निकाला जा रहा है और ये केवल इसलिए कि राम है। उनकी भूमि के लिए लोग कितना परेशान हैं और संख्या भी उसके पीछे दौड़ रही है। अब देखिए, मैं क्यों दौड़ूं?”

“In The Name Of God” - Watch the documentary here:


This documentary focuses on the campaign waged by the militant Vishwa Hindu Parishad (VHP) to destroy a 16th century mosque in Ayodhya said to have been built by Babar, the first Mughal Emperor of India. The VHP claim the mosque was built at the birthsite of the Hindu god Ram after Babar razed an existing Ram temple. They are determined to build a new temple to Ram on the same site. This controversial issue, which successive governments have refused to resolve, has led to religious riots which have cost thousands their lives, culminating in the mosque's destruction by the Hindus in December of 1992. The resulting religious violence immediately spread throughout India and Pakistan leaving more than 5,000 dead, and causing thousands of Indian Muslims to flee their homes. Filmed prior to the mosque's demolition, “In The Name Of God” examines the motivations which would ultimately lead to the drastic actions of the Hindu militants, as well as the efforts of secular Indians - many of whom are Hindus - to combat the religious intolerance and hatred that has seized India in the name of God.

Users can contact Anand Patwardhan at anandpat@gmail.com for the DVDs. You can join his facebook page to keep updated of his documentary screenings and activities.