Saturday, February 1, 2014

फिल्में ही नहीं मैं जिंदगी के दूसरे अध्यायों पर भी ध्यान देता हूं, बच्चों को रोज कहानी सुनाता हूं, वक्त क्षणभंगुर है, जो अभी आसपास है एक सेकेंड बाद नहीं होगाः अमित कुमार

 Q & A. .Amit Kumar, film director (Monsoon Shootout).

Nawazuddin Siddiqui in a still from 'Monsoon Shootout.'

उनकी ‘द बाइपास’ काफी वक्त पहले देखी। दो चीजों ने ध्यान आकर्षित किया। पहला, इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी को एक साथ किसी फ़िल्म में कांटेदार अभिनय करते देखना। दूसरा, बिना किसी शब्द के तकरीबन सोलह मिनट की इस फ़िल्म को बनाने वाले किसी अमित कुमार के निर्देशन और नजरिए को लेकर जागी जिज्ञासा। उनके बारे में ढूंढा, पर वे गायब थे। फिर उनके नए प्रोजेक्ट के बारे में सुना... ‘मॉनसून शूटआउट’। इसमें भी प्रमुख भूमिका में नवाज थे। उनसे बात करनी थी, संपर्क किया और कुछ महीनों के इंतजार के बाद कुछ महीने पहले उनसे बात हुई।

बेहद अच्छे मिजाज के अमित भारत में जन्मे और अफ्रीका में पले-बढ़े। पढ़ाई के बाद कई बड़ी होटलों, बैंकों और अमेरिकन एक्सप्रेस जैसे बहुराष्ट्रीय समूह में नौकरी की। पर रुचि शुरू से फ़िल्मों में थी। पैरिस के एक फेमिस फ़िल्म स्कूल वर्कशॉप का भी हिस्सा बने। बाद में दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। यहां से रुख़ पुणे के फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की प्रवेश परीक्षा का किया और दाखिला हो गया। उनकी पत्नी अनुपमा भी एफटीआईआई में पढ़ चुकी हैं और लेखिका-निर्देशिका हैं। यहां से निकलने के बाद वे निर्देशक आसिफ कपाड़िया की फ़िल्म ‘द वॉरियर’ में सहयोग करने लगे। दोनों का नाता यहां से गहरा हुआ। फ़िल्म को बाफ्टा मिला और इरफान खान को अभूतपूर्व प्रसिद्धि। 2003 में अमित ने अपनी शॉर्ट फ़िल्म ‘द बाइपास’ बनाई। इसे बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म का बाफ्टा मिला। इसी दौरान उन्होंने ‘मॉनसून शूटआउट’ बनाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। उन्होंने ब्रिटेन की फ़िल्म काउंसिल से संपर्क किया जहां से सहयोग मिला। ‘द बाइपास’ के प्रोड्यूसर ट्रेवर इंगमैन भी फ़िल्म से जुड़े। अमित को एक भारतीय निर्माता की भी तलाश थी। यहां दुविधा ये थी कि काउंसिल का बजट ज्यादा था लेकिन शर्त थी कि राशि का उपयोग सिर्फ ब्रिटेन में ही किया जाए, और कोई भारतीय निर्माता इसलिए नहीं जुड़ रहा था क्योंकि बजट काफी ऊंचा था। बाद में यूके फ़िल्म काउंसिल ने अपने हाथ खींच लिए। स्क्रिप्ट तैयार थी पर फ़िल्म लटक गई।

फिर आठ साल बाद यानी 2011 में फ़िल्म शुरू हुई। भारतीय निर्माता के तौर पर गुनीत मोंगा (सिख्या एंटरटेनमेंट) और अनुराग कश्यप जुड़े। फ़िल्म के निर्माण के दौरान आसिफ कपाड़िया क्रिएटिव प्रोड्यूसर रहे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विजय वर्मा और नीरज कबी (शिप ऑफ थिसीयस), तनिष्ठा चैटर्जी और श्रीजीता डे की भूमिकाओं वाली ये फ़िल्म एक साल से बनकर तैयार है और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में दिखाई जा रही है। पिछले साल मई में 66वें कान फ़िल्म फेस्ट में इसकी आधी रात के बाद की स्क्रीनिंग हुई। अब इस 4 और 5 फरवरी को बर्लिन के फ़िल्म वीक में इसे दिखाया जाना है।

अमित अपनी अगली फ़िल्म की योजना बना चुके हैं। ये दूसरे विश्व युद्ध की कहानी पर आधारित होगी। फ़िल्म का नाम ‘गिव मी ब्लड’ रखा गया है। इसका प्रोडक्शन जल्द ही शुरू हो सकता है। इससे पहले ‘मॉनसून शूटआउट’ को भारत में रिलीज किया जाना है। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीतः

Amit Kumar
कहां रहते हैं?
मुंबई में। काम के सिलसिले में बाहर के चक्कर लगते हैं, घर मुंबई में ही है। पेरेंट्स दिल्ली में रहते हैं।

‘मॉनसून शूटआउट’ भारत में कब लगेगी?
कुछ भारतीय प्रदर्शकों को दिखाई थी, उम्मीद है कि इस साल रिलीज हो जाएगी।

बीते साल ‘द लंचबॉक्स’, ‘शिप ऑफ थिसीयस’ और ‘शाहिद’ जैसी फ़िल्में सिर्फ वैश्विक फ़िल्म महोत्सवों तक नहीं सिमटकर रहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर प्रदर्शित हुईं। अपनी फ़िल्म के लिए भी क्या वैसी ही अपेक्षाएं हैं?
हां, बड़े स्केल पर रिलीज करना चाहते हैं। बाकी देखते हैं, कैसे होता है। अभी कुछ फाइनल नहीं है।

आपने इस फ़िल्म को बनाने में जिंदगी के दस साल दे दिए। क्या ‘मॉनसून शूटआउट’ इस काबिल थी कि उसे आप जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा दे दें?
 एक तरह से निजी चीज है। क्या ये फ़िल्म इतना डिजर्व करती थी या नहीं? इसका उतर तो मैं नहीं दे सकता। क्योंकि, अंततः बात ये है कि आप क्यों बना रहे हैं? कोई कहता है, पैसा कमाने के लिए बना रहा हूं। ऐसे में एक फ़िल्म दस साल में बनाओगे तो कोई फायदा नहीं। मेरा मोटिवेशन ये आइडिया था। मेरा मोटिवेशन ये एक पॉइंट है कि जो मेरे दिमाग में है वो लोगों को स्टोरी की फॉर्म में दिखना चाहिए। चाहे कितनी भी बाधाएं आएं पर फ़िल्म बनानी है। और भी कई रहे होंगे जो दस साल लगाकर भी एक फ़िल्म नहीं बना पाए। और भी कई हैं जो नए आइडिया पर ही लगे हैं, बनाना तो बहुत दूर है। तो ये (मॉनसून...) बन गई। अब फ़िल्म फेस्टिवल्स में घूम रही है। दर्शकों के साथ कनेक्ट करेगी। मेरे लिहाज से तो ये वर्थ इट (काबिल) थी। जब बनी तो, इंडि फ़िल्ममेकर्स के लिए जो सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म होता है कान फ़िल्म फेस्टिवल, वहां सम्मान मिला। हालांकि ये कान का सम्मान नहीं भी होता तो मेरे लिए फ़िल्म वर्थ इट है।

इतना वक्त क्यों लगा, आगे भी इतना ही वक्त लगाएंगे? यदि हां, तो कैसे चलेगा? क्योंकि कमर्शियल फ़िल्म होगी तो कोई आर्थिक प्रारूप इतने लंबे वक्त में फ़िल्म को सपोर्ट नहीं करता, अगर इंडिपेंडेंट भी बनाएंगे तो इस हिसाब से पूरी जिंदगी में कितनी कहानियां कह पाएंगे?
मेरी पर्सनैलिटी का असर पड़ता है फ़िल्म पर। कई लोग सिंगल माइंडेड होते हैं। मैं बैंलेस्ड हूं। मेरे दो बच्चे हैं। उनके साथ टाइम बिताता हूं, सब कुछ करता हूं। दूसरा ये कि कहानी या फ़िल्म को लेकर सिंगल माइंडेड ऑब्सेस्ड हूं तो विचार आते हैं कि इस तरह से ये-ये बनाना है और उसके लिए फिर प्रोजेक्ट के सही हिस्से मिलने चाहिए जो आपके विजन से मेल खाते हों। फ़िल्म को ऐसे ही बनाना चाहिए। मेरे लिए फ़िल्म में वो हिस्से ढूंढने मुश्किल थे। उसमें वक्त लगा। अब स्वीकार्यता आ गई है इंडि सिनेमा में कि नई स्टोरी है, पर अच्छी है। अलग टाइप को स्वीकार करते हैं। आसान हो गया है, ऐसे विचारों पर बनाना। अंतत ‘मॉनसून शूटआउट’ एक थ्रिलर ही है, बस अलग अप्रोच से बनाई गई है।
   खैर, मेरा तो यही तरीका है। अलग तरीका हुआ तो ये हो सकता है कि लिखने में टाइम ज्यादा लगे पर जल्दी बन जाए। ‘मॉनसून शूटआउट’ में कहानी लिखने में टाइम लगा, फिर प्रोसेस में मोटे बदलाव करने पड़े। शुरू से शुरू करना पड़ा। आपकी बात सही भी है। आगे वाली फ़िल्म, आशा है अच्छे ढंग से बनाएंगे। कम टाइम लगेगा। लेकिन कहना चाहूंगा, मैं किसी दौड़ में नहीं हूं, कोई जल्दी नहीं है।
   साइड बाइ साइड दूसरा काम भी चलता रहता है। सिर्फ फ़िल्में ही नहीं हैं। पर्सनल चॉयस में लोग जिंदगी के दूसरे अध्यायों पर ध्यान नहीं देते, मैं देता हूं। बाकी जितनी फ़िल्में बना पाया उतना अच्छा। कुछ खास कहानियां हैं, कुछ खास पार्टनर हैं तो उन्हीं पर ध्यान है। कई चीजें संयोगवश होती हैं। एक साल में भी हो जाता है और दस साल भी लग जाते हैं। एक स्क्रिप्ट में तीन साल लगे और एक है जो एक साल लिखी है।

The Bypass (2003)
‘द बाइपास’ कैसे बनी? आज के दो बेहद प्रभावी अभिनेता इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी पहली बार 2003 में आपकी इसी शॉर्ट फ़िल्म से साथ दिखे थे। उन्हें कैसे कास्ट किया?
मैं ‘द वॉरियर’ (2001) में उसके निर्देशक आसिफ कपाड़िया के साथ काम कर रहा था। हम साथ घूमते थे। मैं सहयोगी निर्देशक था। उनकी ग्रेजुएशन फ़िल्म के दौरान मिला था। साथ में हुए, लोकेशन रेकी की। तब मैं अपने आइडिया उन्हें बताता रहता था। एक ‘द बाइपास’ का बताया था और एक ‘मॉनसून शूटआउट’ का। फिर काफी दिन बाद उन्होंने मुझे फोन किया। बोले कि एक फ़िल्म कॉम्पिटीशन (UKFC Cinema Extreme short film programme) है, उसमें अपनी कहानी जमा करवा दो, कौन सी करवाना चाहोगे? मैंने कहा कि ये दो हैं पर मैं ‘मॉनसून शूटआउट’ को करवाना चाहता हूं। पर वे बोले कि ‘द बाइपास’ कर दो, ये अच्छी कहानी है। हालांकि मेरा मन नहीं था पर उनकी बात मानी और वो ही किया। फिर बनाने की बात आई तो ‘द वॉरियर’ के कास्टिंग डायरेक्टर रह चुके तिग्मांशु धूलिया से संपर्क किया। उन्होंने ‘द बाइपास’ की कास्टिंग की। इरफान को लिया। उसके बाद नवाजुद्दीन को लिया। नवाज का जिक्र हुआ तो बोले कि स्टार बेस्टसेलर्स में एक लड़का था वो अच्छा है। मैंने सीरियल देखा, उसमें एक दृश्य है जिसमें नवाज का किरदार मुड़कर आइने में देखता है, तो मुझे उसकी आंखें बहुत अच्छी लगीं, मेरे जेहन में बस गई। मैंने उसे बुलाया, ऑडिशन लिया। मुझे तुरंत लगा कि यही है मेरा दूसरा किरदार। यूं बनी।

फ़िल्ममेकिंग के इतने लंबे बाधा भरे सफर में निराश नहीं हुए? दूसरा, आपने ‘मॉनसून...’ की कहानी 2003 से भी पहले सोच रखी थी। ऐसे में जब इंसानी दिमाग में हर पल विचार, विजुअल, भाव बदल जाते हैं, आपने इतने लंबे वक्त तक अपनी इस फ़िल्म की कहानी और तीव्रता को कैसे जस का तस सहेजकर रखा?
मेरा एक दार्शनिक नजरिया (Philosophical Approach) जो है जिंदगी को लेकर, वो एक तरह से फिक्स है। उसी के आसपास जिंदगी के बाकी अध्यायों और हिस्सों को देखता हूं। उसमें आमतौर पर फ्रस्ट्रेशन का कॉलम नहीं आता। नहीं तो वो बाधा बन सकती है, कि यार इतने साल से कर रहा हूं। तो वो नहीं आने देता। दूसरी बात कि स्टोरी की इमोशनल इंटेग्रिटी को बनाए रखना एक लंबे वक्त तक। मेरे लिए दिमाग में वो जमा है, एक तकरीबन ठोस आकार में है। यानी विजुअली है। सिर्फ शब्द ही नहीं है। एक तरह से वो फ़िल्म बन गई है दिमाग में। अब चाहे अगले दिन शूट करूं या चार दिन बाद, दिमाग से ही निकालनी है। हां, लिखते हुए स्टोरी बदलती है, लेकिन जो भी उसका दिल है वो इस पूरे सफर के दौरान मन में पूरी छत्रछाया में रहता है। ये अब तक का अनुभव है।

आगे किस कहानी पर फ़िल्म बनाएंगे?
अपने जर्मन फ़िल्ममेकर दोस्त फ्लोरियन गॉलनबर्गर (Florian Gallenberger) के साथ 2007 में उसकी फ़िल्म (City of War: The Story of John Rabe, 2009) के निर्देशन में सहयोग किया था। इसकी रिसर्च (‘सिटी ऑफ वॉरः द स्टोरी ऑफ जॉन रेब’, दरअसल जॉन रेब नाम के जर्मन बिजनेसमैन की कहानी थी जिसने अपनी नाज़ी सदस्यता का इस्तेमाल 1937-38 में नेनकिन नरसंहार के दौरान 2 लाख से ज्यादा चीनी नागरिकों की जान बचाने में किया था) कर रहा था तो मुझे एक कहानी मिली। ये दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की बात है। तभी से तय कर लिया कि इस पर फ़िल्म (Give Me Blood) बनानी है। ये मेरी अगली फ़िल्म हो सकती है।

आप कैसे इंसान हैं? क्योंकि बातचीत से लग रहा है कि बहुत तनाव में नहीं रहते, बेहद कूल हैं। ऐसे कैसे?
मैं बहुत शांतचित्त और ढीला आदमी हूं। टकराव ज्यादा पसंद नहीं करता। रिलैक्स होना पसंद करता हूं। आमतौर पर ज्यादा गुस्सा नहीं करता। जिंदगी के प्रति रवैया ये है कि हम लोग समझते हैं कि कंट्रोल में हैं पर होते नहीं हैं। इसलिए किसी चीज को कंट्रोल में करने की कोशिश कर रहे हैं और हो नहीं रही। ये ‘मॉनसून...’ की जर्नी में बहुत हुआ। ब्रिटिश फ़िल्म काउंसिल ने आधे रास्ते में ही हाथ खींच लिए तो दोस्त चिल्लाने लगे, बहुत चिंतित हुए, लेकिन मैंने कहा, कोई बात नहीं। मैं आम मध्यमवर्गीय परिवार से हूं जो बच्चों को इंजीनियर बनाने के सपने देखते हैं। मैंने जैसे-तैसे अपने सपने फ़िल्म बनाने के, पूरे कर लिए। मुझे कोई शिकायत नहीं है। नहीं हुआ यार तो कोई बात नहीं, मेरा यही रास्ता है, ठीक है। मुझे हंसने में बहुत मजा आता है। जोक करने में आता है। खाना बनाना बहुत अच्छा लगता है। हर तरह की फ़िल्म देखना पसंद है। कमर्शियल, आर्टहाउस, रोमैंटिक, मसाला। ये नहीं कि जैसी बनाता हूं वैसी ही देखता हूं। परिवार के साथ बहुत वक्त बिताना चाहता हूं।

पर आपको ईर्ष्या, दुख या पछतावा नहीं होता कि 2003 में आपने ‘द बाइपास’ बनी ली थी, जिसे बाफ्टा तक में सम्मान मिला? उसके बाद 2014 तक में आपकी दूसरी फ़िल्म लोगों के बीच पहुंच नहीं पाई है जबकि इतने वक्त में लोगों ने कितनी शानदार फ़िल्में बना ली और बतौर फ़िल्ममेकर अपने सफर में बहुत आगे पहुंच गए। आप अब तक शुरू भी ढंग से नहीं हुए, बहुत पीछे रह गए। जलन नहीं होती कि यार उस लड़के ने, जो बच्चा ही था, इतनी जोरदार फ़िल्म बना दी और मुझे वो सम्मान नहीं मिला?
मेरा दृष्टिकोण है कि मेरा ये पथ है और आपको वो है। है न? दूसरे फ़िल्ममेकर ने फाड़ू फ़िल्म बना दी हो 20 की उम्र में और मैं 50 का हूं, तब मैं सोचूं, यार मैंने नहीं बनाई। हो सकता है वो 23 के बाद कोई न बनाए, मैं 55 के बाद फाड़ू बना दूं। तो अपने पथ में खुश हूं। उसने ये कर लिया मैंने क्यों नहीं किया? ये तुलना नहीं करता। अगर मुड़ें तो देखेंगे कि आज अगर निराशा आती है तो कल पॉजिटिविटी आ जाती है। जब निराशा आती है तो लगता है दुनिया ख़त्म हो गई। पर पिछली बार ऐसे ही मौके को देखो तो पता चलेगा कि ये बीतेगा। मैं तो प्रेरणा की तरह ले लेता हूं। बड़ी फ़िल्म हो तो सोचता हूं, यार... कमाल, ऐसी फ़िल्म बन गई। मैं मानता हूं कि ये अकेले डायरेक्टर का नहीं है, पूरी टीम का है। ‘द बाइपास’ में आप राजीव रवि (कैमरा वर्क) का काम देखिए। एक्टर्स को देखिए। मैं तो इस तरह से लेता हूं।

बचपन से लेकर अब तक ऐसी कौन सी फ़िल्में रही हैं जिन्होंने सम्मोहित कर दिया जो शानदार लगीं?
एक फ़िल्म अभी आई ‘वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलिया’ (Once Upon a Time in Anatolia, 2011)। बहुत बढ़िया लगी। लगा, यार, लोग ऐसा कमाल का काम कर रहे हैं। मतलब, होप है कि मैं भी करूंगा और कमाल की फ़िल्में बनाऊंगा। फिर 2012 में देखी ‘अ सैपरेशन’ (A Separation, 2011)। कमाल की फ़िल्म बनाई यार। कोई बोलेगा, कोई एक्शन नहीं, छोटा सा कमरा, लव अफेयर भी नहीं चल रहा। सिंपल है, पर क्या ग्रिपिंग बना ली। ‘पल्प फिक्शन’ (Pulp Fiction, 1994) पहली बार देखी तो एक-एक चीज, डायलॉग्स, स्टेजिंग, एक-एक चीज कमाल लगी। ‘चारूलता’ (Charulata, 1964) बहुत बढ़िया लगती है। हर कोई ‘पाथेर पांचाली’ (Pather Panchali, 1955) को महान कहता है, मैं ‘चारूलता’ को डिफाइन नहीं कर पाया, पर बहुत अलग है। ‘सत्या’ (Satya, 1998) बहुत अच्छी लगी थी। उससे पहले रामू (राम गोपाल वर्मा) की ‘शिवा’ (Shiva, 1989) बहुत अच्छी लगी। तब मैं दिल्ली में कॉलेज में था। पोस्टर लगा तो देखा कि यार कौन सी है, कमाल है। मैंने उसके बाद फिर हालांकि देखी नहीं। ‘शोले’ (Sholay, 1975)। मैं बचपन में इंडिया में रहता था। फिर हम अफ्रीका चले गए। वहां मैं और मेरा भाई इस फ़िल्म के किरदारों की नकल उतारते थे। शायद उसी की वजह से मैं फ़िल्ममेकर बना हूं। वहीं से कर-कर के स्टोरीटेलिंग सीखी। कि जय और वीरू ही क्यों बने हैं, स्पाइडरमैन बन जाते हैं। एक फ्रेंच फ़िल्मकार हैं लियो कैरेक (Leos Carax), उनकी फ़िल्म ‘मोवे सांग’ (Mauvais Sang, 1986) देखी। दिल्ली में फ्रेंच एंबेसी में एक फ़िल्म फेस्टिवल में देखी, तब मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ रहा था। इसके अलावा ‘वंस अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट’ (Once Upon a Time in the West, 1968)। कमाल की फ़िल्म है। अकीरा कुरोसावा (Akira Kurosawa) की ‘सेवन सामुराई’ (Seven Samurai, 1954)। ‘स्टॉकर’ (Stalker, 1979), आंद्रेई तारकोवस्की (Andrei Tarkovsky) की। ‘अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंग’ (A Short Film About Killing, 1988)। एक शानदार चिलियन फ़िल्ममेकर हैं मिग्वेल लिटिन (Miguel Littín) उनकी फ़िल्में कमाल की हैं, अगर आपको किश्लोवस्की की ‘अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंग’ फाड़ू लगती है न, कि क्या मासूम लोग हैं और इनके साथ क्या हो रहा है, तो आप इनकी फ़िल्में देखिए।

क्या आप फ़िल्मों की श्रेष्ठता को उस लिहाज से देखते हैं कि विमर्श और आलोचना पर खरी कौन उतरी है, या यूं ही? जैसे सत्यजीत रे हैं। उनकी फ़िल्में आलोचना के तकरीबन सभी मानकों के पार जाती हैं। स्क्रीनप्ले, सौंदर्य, तकनीक से प्रयोग, विचार, एडिटिंग, कुल कंपोजिशन, और भी बहुत कुछ। सबमें वे अव्वल खड़े हैं। क्या उनके समकक्ष या उस लिहाज से आपके पसंदीदा कोई निर्देशक हैं? क्या आप फ़िल्मों को ऐसे देखते हैं?
रे साहब की तरह विट्टोरियो डी सिका (Vittorio De Sica) थे। वैसे सच कहूं तो मैंने कभी फ़िल्मों को उस तरह से नहीं देखा। मेरे लिए फ़िल्म उस तरह मायने रखती है कि मैंने देखी और मेरे दिल में क्या भाव पैदा किए और मैं कितने दिन उसके बारे में सोचता रहा। जब ‘अ सैपरेशन’ देखी तो शॉट्स के बारे में नहीं सोचता रहा। बस देखने के बाद तक महीनों देखता रहा। जैसे आपको ‘चारूलता’ का जिक्र करता हूं तो दिमाग में उसका सीन क्रिएट होता है। तो वो एक्चुअली बताना बड़ा मुश्किल है। बहुत सारी चीजें उसमें शामिल होती हैं। कई बार गलत हो सकती हैं, परफेक्ट बन सकती हैं। मैं उस तरह से देखता हूं। फैलिनी (Federico Fellini) की ‘8 एंड अ हाफ’ (8½, 1963) ले लीजिए। ये जादुई फ़िल्में हैं। मेरे लिए ‘स्टॉकर’ बड़ी जादुई है। मैं ये नहीं सोचता कि रे अकेले खड़े हैं।

फ़िल्म को आप कैसे देखते हैं? खासकर ऐसी फ़िल्मों को जो किसी आइडियोलॉजी की बात करती हैं या जो बहुत गूढ़ और घने विचार लिए होती हैं। जैसे, कोपोला (Francis Ford Coppola) की ‘अपोकलिप्स नाओ’ (Apocalypse Now, 1979) को देखें तो चुंधिया देने वाली फ़िल्म है। अब इसे समझने के लिए आप किस स्तर तक जाएंगे? क्या आप उतना समझ लेंगे जितना निर्देशक को खुद समझ आया होगा? वो पूरा विमर्श, वो अमरत्व की बात, वियतनाम युद्ध का संदर्भ और सही-गलत का पूरा व्यापक प्रश्न।
मेरे लिए जरूरी ये है कि फ़िल्म का मुझ पर प्रभाव क्या होता है। मैं ब्रेक डाऊन नहीं करता या उसे तोड़ता नहीं कि ये फिलॉसफी रही होगी। फाइनली फ़िल्मकार ने जो भी हलवा बनाया होगा या जो भी विषय-वस्तु है, ...मूल उद्देश्य ये है कि लोग देखें और असर पड़े। एंटरटेनमेंट भी हो सकता है असर। कॉमेडी फ़िल्म है तो उद्देश्य है लोगों को हंसाना। हॉरर का डराना है। पॉलिटिकल का कुछ और है। मैं सवाल नहीं करता कि उन्होंने ऐसे बनाई। मुझे याद है जब पहली बार देखी तो सोचा, कि क्या बनाई है यार ‘अपोकलिप्स नाओ’। मैं ये नहीं सोच रहा हूं कि क्या पागलपन बनाया है। कभी-कभी समझ ही नहीं पाता हूं। ‘नो स्मोकिंग’ देखी हॉल में तो थोड़ी समझ आई, पर बाद में उलझ गया कि डायरेक्टर ये नहीं वो दिखा रहा है, कुछ और चक्कर है। तो ऐसे ही एंजॉय करता हूं न। पूरा देखा तो अंत में एक असर था। मैंने पहली बार फ़िल्म के बारे में बात की तो कहा कि यार प्रभावित हूं।

टैरेंस मलिक की फ़िल्में कितनी समझ आती हैं?
मैं कुछ देखता हूं, समझ आती है तो ठीक, नहीं आती तो ठीक। जैसे कोई शेफ बहुत बढ़िया सुशी बनाता है तो बनाए, मैं पावभाजी ही खाना चाहता हूं। ‘वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलिया’ मेरी वाइफ ने मुझे रेफर की थी। बोली कि गजब है, देखो! मैंने देखी तो सो गया, क्या कमाल-वमाल। फिर एक बार दोबारा देखी तो ग्रिप में रह गया, देखता ही रह गया। वो तब की मानसिक अवस्था भी थी। उसका भी फर्क पड़ता है। कहने का मतलब ये है कि कुछ हो फ़िल्म में, तो चांस दो। मुझे कोई अनिवार्यता नहीं लगती।

अपनी फ़िल्म में आप न जाने कितनी बातें कहते हो, संदर्भ रखते हो, कितने इशारे करते हो लेकिन दर्शक उनमें से ज्यादातर नहीं देखता। ऐसे में दुख नहीं होता कि जितनी कोशिश की वो पूरी तरह कोई समझा ही नहीं? जैसे आपने कहा कि पहली बार में ‘वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलिया’ आपने खारिज ही कर दी थी, जबकि तब भी उसमें उतनी ही शानदार चीजें थीं।
अब जैसे मैंने ‘मॉनसून शूटआउट’ बनाई। मैंने मान लीजिए उसमें 50 चीजें डाली। और 90 परसेंट दर्शकों ने उन 50 चीजों में से सिर्फ 20 चीजें लीं। कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि वो 20 भी मैंने ही डाली थीं। कुछ लोग 40 चीज लेंगे। कुछ लोग 60 ले लेंगे। उनके पर्सनल एक्सपीरियंस से वो लेते होंगे। कोई बोलेगा कि आपने फ़िल्म के उस सीन में वो किया था न, कमाल था। और उस वक्त मैं मन ही मन सोचूंगा कि यार ऐसा तो मैंने सोच कर डाला ही नहीं था। तो ये मेरी ड्यूटी है कि जो डालना चाहता हूं डालूं, और लेने वाले का अपना है वो क्या ले। 10 ले, 50 ले, मेरे डालने से ज्यादा ले। हर इंसान का अलग होता है। जितना ज्यादा लोग देख पाएं।

‘मॉनसून...’ को लेकर सबसे यादगार प्रशंसा आपको क्या मिली है?
कान (Cannes International Film Festival) में आधी रात की स्क्रीनिंग थी फ़िल्म की। बारिश हो गई थी तो थोड़ा सा आगे खिसक गई थी। 12 की जगह रात 1.30 बजे फ़िल्म शुरू हई। खत्म हुई 2.30-3 बजे। तब फ़िल्म को 10 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला। कोई औपचारिकता नहीं थी, अच्छी नहीं लगती तो लोग चले जाते हैं। दुनिया भर के लोग आए हुए थे, वो रात को पब में जा सकते थे लेकिन ‘मॉनसून...’ देखने आए। इसका मतलब ये हुआ कि मैंने जो 50 चीजें डाली हैं उनमें से ज्यादातर पकड़ में आईं उनके। मुख्य बात ये है कि फ़िल्म से जुड़ाव बना उनका। इतने सारे लोग थे और खड़े होकर तालियां बजा रहे थे आधी रात को, तो ये अच्छा लगा।

आप छोटे थे तो ऐसी कौन सी चीजें थीं जिन्होंने कहानियों की रुचि आपमें डाली? किताबें, फ़िल्में, साहित्य, पड़ोस, दोस्त, माहौल, परिवार के लोग... क्या? क्या यादे हैं?
मेरे बाबा थे। वो कहानियां सुनाते थे, जब हम छोटे थे। एक याद है। कोई किंगकॉन्ग की थी। वो विजुअली याद है। वो एक किंगकॉन्ग है, लड़की है, बाल बना रही है। तो वो यादें, दृश्य दिमाग में बैठे हुए हैं। ‘शोले’ का असर था। मैं और मेरा भाई गेम्स खेलते थे। फ़िल्म को लेकर अभिनय करते थे। एक-दूजे के सामने बैठकर फ़िल्म की कहानी सुनाते थे। ये खेल खूब खेलते थे। क्योंकि हम लोग अफ्रीका में रहते थे, तो सब अमेरिकन शो आते थे। कॉमिक्स पढ़ता था। विश्व युद्ध-2 की कॉमिक्स खूब थीं। हो सकता है रूचि वहीं से आई हो। बैटमैन-स्पाइडरमैन नहीं पढ़ी। फैनटैस्टिक फोर और सुपरमैन पढ़ता था। अब अपने बच्चों को रोज कहानी सुनाता हूं। दो बच्चे हैं, दोनों को एक-एक शब्द चुनने को कहता हूं। और उन्हें मिलाकर कहानी बना देता हूं।

बच्चों को कहानी सुनाने का वक्त कैसे निकाल लेते हैं? जबकि गीक्स या अन्य तरह के फ़िल्मकारों को अपनी फ़िल्मों के अलावा कोई चीज नहीं दिखती।
देखिए, मैं मानता हूं कि वक्त बहुत क्षणभंगुर है। जो है आसपास, वो एक सेकेंड बाद नहीं है। कोई बोले कि यार टाइम नहीं है, बहुत फ़िल्में बनानी हैं। कोई बोले कि लाइफ में इतने सुख हैं, परिवार वगैरह। तो दोनों ही चीजें निकल ही रही हैं न। अभी बच्चे छोटे हैं तो कहानियां सुना सकता हूं। बड़े हो जाएंगे तो अपनी कहानी खुद सुनेंगे। अभी कैसी भी कहानी की तारीफ करते हैं, बाद में नहीं करेंगे। कभी-कभी मीटिंग होती तो छूट जाता है। लेकिन ये रात का रिचुअल है जो मैं करता ही हूं। अपना दृष्टिकोण है। मुझे लगता है कि बात करनी जरूरी चीज है।

2012-13 में कौन सी फ़िल्में बेहद अच्छी लगीं?
‘शाहिद’ की शुरुआत ही देख पाया, पूरी नहीं देखी, मुझे लगा कि बहुत बढ़िया होगी। ‘द लंचबॉक्स’ बहुत बढ़िया फ़िल्म है यार। रितेश की ‘कैफे कायरो’ भी बहुत अच्छी लगी। कन्नड़ फ़िल्ममेकर हैं पवन कुमार उनकी ‘लुसिया’। लंदन में अवॉर्ड मिला था। कमाल की फ़िल्म लगी मुझे। ‘पैडलर्स’ अच्छी है। कम से कम लोग इन फ़िल्मों को देख तो लें। और भी कई फ़िल्में रहीं, मैं सबको देख नहीं पाया।

आपके जीवन का दर्शन क्या है?
मेरी फिलॉसफी है कि जो होना है वो होगा। वो आपके कंट्रोल से बाहर है। मैं चिंता नहीं करता। ‘मॉनसून...’ अभी के अभी रिलीज हो! क्यों नहीं हो रही? क्या है यार! ये नहीं करता। प्रोग्रैमर या आपके भगवान को आपका पथ पता है, तो एक हफ्ते तक मैं क्यों परेशान होता रहूं? कौन करेगा? कब करेगा? नहीं सोचता।

वेद-पुराण भी पढ़े हैं क्या? पुराणों में किसी फिलॉसफी को मानते हैं?
ये मेरी मम्मी मजाक करती हैं कि तुम तो ज्ञानी हो। वो पूजा-पाठ करती रहती हैं। मैं पूछता हूं कि पूजा तो रोज करती हैं कि फिर टेंशन क्यों लेती हैं। मेरे ख्याल से माइथोलॉजी में मैं श्रीमद्भगवद्गीता का फैन हूं। ये नहीं कि दो साल पहाड़ी में जाकर पढ़ा है, जो भी पढ़ा वो कनेक्शन हो गया है। जो विचार हैं न, वो फ्रेजेज में भी होते हैं। टीवी में, किताबों में, कहानियों में, सब में उस विचार का निचोड़ (एसेंस) आ जाता है। घर में मम्मी कुछ-कुछ रेफर करती थीं पढ़ने के लिए और एक बार मैंने गीता का साधारण संस्करण देखा, वैसे भी देखता रहता था। एकदम सटीक याद नहीं कब-क्या पढ़ा।

मंदिर जाते हैं? धर्म को लेकर आपके रिचुअल क्या हैं?
सबका अपना विचार होता है। मैं कभी धार्मिक नहीं था। मैं पूजा करना और मंदिर जाना वगैरह नहीं करता था। मेरा ये नहीं कि जाना ही है। कोई मंदिर कला और स्थापत्य का अद्भुत नमूना है तो देखने जाता हूं। भगवान तो दिल में रहता है। कर्म-कांड पहले किए हों तो याद नहीं लेकिन अब नहीं करता हूं। कई चीजें मैं देखता था बचपन में, अब एक फ़िल्मकार के तौर पर देखता हूं तो पता चलता है कि खास नहीं थीं। अब तो बच्चे कार्टून देखते हैं तो मैं भी मजे से देखता हूं। वो फीलिंग जबरदस्ती नहीं पैदा करनी चाहिए।

‘मॉनसून...’ की कहानी क्या है? क्या एक पुलिसवाले और अपराधी की है जो बरसात में खड़े हैं और कुछ पलों में पूरी फ़िल्म सिमटी है?
हां, वो ही है। एक कॉप (विजय वर्मा) है। उसने अपराधी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) पर रिवॉल्वर तान रखी है। पलों में ही सबकुछ हो रहा है। वो सोच रहा है कि गोली मारूं या नहीं मारूं? तुरंत फैसला लेना है। लेकिन उन चंद पलों में उसके दिमाग में कई कहानियां, घटनाएं, नैतिक सवाल तैर रहे हैं।

फ़िल्म शूट करने की आपकी प्रक्रिया क्या होती है? आप अपने सिनेमैटोग्राफर के साथ मिलकर सीन्स की योजना कैसे बनाते हैं, उसके लुक को लेकर क्या बातें करते हैं? अभिनेताओं को आप कैसे ब्रीफ करते हैं, उनसे क्या भाव निकलवाने की कोशिश करते हैं?
मेरी दोनों ही फ़िल्मों के सिनेमैटोग्राफर राजीव रवि रहे हैं। हम दोनों एफटीआईआई में साथ पढ़े हैं। हमारी आपसी समझ अच्छी है। हम लोग शूट करने से पहले संदर्भों पर बात करते थे कि दृश्य कैसे चाहिए, कैसे नहीं। जैसे ‘द बाइपास’ में हमने तय किया कि रेत का रंग मौलिक रहे। वो सुनहरे रंग की ग्लैमरस रेत नहीं होगी जो फ़िल्मों में दिखाई जाती है। वो साधारण रेत होगी। लोग सूर्यास्त के वक्त शूट करते हैं, हमने चिलचिलाती धूप में किया। उसी तरह ‘मानसून...’ में हमने इस पर बहुत बात की कि बरसात को कैसे दिखाएंगे। तो बरसात हमारा विजुअल रेफरेंस पॉइंट है। सब उसी से निकला। जहां तक अभिनेताओं से बात करने का सवाल है तो उनके साथ शुरुआती प्रक्रिया गहरी होती है। जब तक हम वर्कशॉप खत्म करते हैं सब एक्टर्स को पता होता है कि अपने और फ़िल्म के परफॉर्मेंस को कहां ले जाना है। इस तरह योजना बनाने से थोड़ा आसान हो जाता है। एक सीन के लिए सही बिंदु मिल गया तो सारी फ़िल्म के लिए मिल जाता है। तो एक-एक सीन का गहराई से अभ्यास करने की जरूरत नहीं होती।

कैमरे कौन से इस्तेमाल किए?
एलेक्सा डिजिटल (Alexa digital) है, वो ही यूज किया। फाइव डी (Canon 5D) भी। कुछ पलों के लिए।

Tannishtha Chatterjee and Nawaz in a still from 'Monsoon Shootout.'
Amit Kumar is a film writer and a director. He lives is Mumbai. He's a graduate from FTII, Pune. He's worked with BAFTA-winning British director Asif Kapadia (Senna) as associate director on his 2001 feature The Warrior, starring Irrfan Khan. He's also worked on Oscar-winning German director Florian Gallenberger's 2004 feature Shadows of Time, which was set in India, and on City of War: The Story of John Rabe, which was released in 2009. Kumar debuted with his acclaimed 2003 short The Bypass, which picked up various awards, including a BAFTA for best short film. His feature debut Monsoon Shootout is doing the rounds for various international film fests. It was in the Midnight Screenings program at 66th Cannes film fest last year. Kumar is planning to release the movie in India this year. His next film is set in WW II called 'Give Me Blood.'
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