रविवार, 11 दिसंबर 2011

सूडानी बच्चों का मशीन गन वाला संत

फिल्मः मशीन गन प्रीचर
निर्देशकः मार्क फॉर्स्टर
कास्टः जेरॉर्ड बटलर, मिशेल मोनाहन, माइकल शैनॉन, मैडलिन कैरल, सोउलेमने सवाने, रेमा मारवेन
सर्टिफिकेटः ए (एडल्ट)
स्टारः तीन, 3.0

सोमालिया के बागियों के खिलाफ अमेरिकी सैनिकों की हेल्प पर बनी 'ब्लैक हॉक डाउन’ और स्टीवन स्पीलबर्ग की 'सेविंग प्राइवेट रायन’ में रिएलिटी और इमोशन दोनों थे। बावजूद इसके दोनों मसाला एंटरटेनर थी। 'मशीन गन प्रीचर’ मसाला एंटरटेनर नहीं है। 'द रम डायरी’ जैसी बायोपिक की तरह ये भी जोड़ती तो है, पर कुछ फॉर्मल है। जैसे लाइफ होती है। फिल्म सैम चिलर्स की जिंदगी पर आधारित है जिन्होंने दक्षिणी सूडान में बच्चों के लिए काम किया। उनके लिए अनाथालय बनवाया और उन्हें अगुवा करने वालों के कब्जे से मुक्त करवाया। मगर असली सैम चिलर्स के काम करने के तरीके को सही और गलत ठहराने का फैसला फिल्म से करने की बजाय, उनके बारे में जानकर ही करें। फिल्म में आते हैं। जब सैम 'लॉड्र्स रजिस्टेंस आर्मी’ की गाडिय़ों पर हमले करके अगुवा बच्चों को छुड़वाना शुरू करता है तो वो सीन थ्रिलिंग बन पड़ते हैं। कुछ-कुछ रंगो को धुकधुकाते हुए। जेरॉर्ड बटलर सैम चिलर्स के रोल के लिए सही चुनाव रहे। उनका साथ देते अश्वेत एक्टर सोउलेमने सवाने भी सुहावने लगते हैं। कुछेक सीन विचलित करने वाले हैं इसलिए मूवी को ए सर्टिफिकेट मिला है। पर फूहड़, फालूदा और टाइमपास फिल्मों के बीच ऐसी फिल्में भी होनी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की तरफ, फिल्मों में ही सही, रुचि जगाए। सूडान और उसके आंतरिक संघर्ष को ही लीजिए। इसमें इंटरनेशनल एजेंसियों की भूमिका भी जांची-परखी जा सकती है। अपने सब्जेक्ट और जरा से हटके ट्रीटमेंट की वजह से ये फिल्म मुझे औसत से अच्छी लगी। फिल्म में अमेजिंग चाइल्ड सिंगर रेमा मारवेन भी हैं। सैम बने जेरॉर्ड की बैप्टिज्म सैरेमनी के वक्त रेमा का फिल्म में असल में अमेजिंग ग्रेस गाना अद्भुत है।कौन है ये वाइट प्रीचर
पेंसिलवेनिया की जेल से सैम चिलर्स (जेरॉर्ड बटलर) छूटा है। ड्रग्स और आवारागर्दी में रहता है। घर पर एक बच्ची (मैडलिन कैरल), बीवी (मिशेल मोनाहन) और मां (कैथी बेकर) है। जब नशे की अति हो जाती है तो बीवी उसे चर्च ले जाती है और नशा छुड़वाती है। खैर, समुद्री तूफान आने से कस्बा तबाह हो जाता है और सैम को हाउसिंग का बिजनेस मिलता है। वो कुछ समृद्ध हो जाता है। एक बार युगांडा से आए किसी मिशनरी को सुनने के बाद उसकी सूडान जाने की इच्छा होती है। वहां लॉड्र्स रजिस्टेंस आर्मी (एलआरए) लोगों पर अत्याचार करती है। खासतौर पर छोटे बच्चों का किडनैप करना, उनके हाथों में हथियार थमाना और उनका यौन शोषण करना। सैम की मुलाकात यहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के एक सैनिक डेंग (सोउलेमने सवाने) से होती है। यहां से सैम दक्षिणी सूडान की हिंसक खूनी हकीकत देखता है और बच्चों को बचाने की कोशिश करता है। पर इस भलाई के काम के लिए भी सैम बहुत सारी मुश्किलों से गुजरता है।

असली सैम का संदेश
दूसरे इंटरनेशनल हेल्प ग्रुप्स के सैम के हिंसक तरीकों की आलोचना करने पर फिल्म के आखिर में असली सैम चिलर्स का वीडियो फुटेज है। उसमें वह कहते हैं, 'कोई अपहरणकर्ता या टेरेरिस्ट आपके बच्चे को अगुवा कर ले। और मैं आपसे कहूं कि आपके बच्चे को वापिस ला सकता हूं। तो फिर, इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं उसे कैसे लाता हूं।‘ फिल्म खत्म होने के बाद भी ये असली डॉयलॉग इम्प्रेस करता है। ये और बात है कि हिंसा कभी जायज नहीं होती।

सोचता हूं...
# जेल से छूटकर आए सैम से घर में सबसे पहले उसकी छोटी सी बेटी मिलती है। कुछ सीन बाद जब वो उम्र में कुछ बड़ी नजर आती है तो पता चलता है कि सैम चिलर्स की जिंदगी के कुछ साल अपने काम को करते हुए बीच चुके हैं। क्योंकि हाउसिंग के काम में फक्कड़ से समृद्ध होने का कोई और संकेत फिल्म में नहीं है। एक सीन है। रात को पेंसिलवेनिया में हरिकेन आता है, सुबह बिजनेस से जुड़ा आदमी आकर कहता है कि बहुत सा बिजनेस आया है, टूटे घरों को बनाने का, करोगे क्या, तो सैम कहता है, 'हां, फिफ्टी-फिफ्टी में।' खैर, यहां के बाद सीधा वो सीन है जहां सैम अपनी वाइफ और बेटी को उनका नया बड़ा बंगला दिखाने लाया है। कुछ पलों में समझ आता है कि सैम पैसे वाला हो गया है। बाद में उसके सूडान जाने और आने के कई मौकों में भी बीतते टाइम का पता उसकी बेटी के बड़े होने से ही लगता है।
# चाहे इसे मिसिंग पहलू कह लें या नया प्रयोग कि सैम के दिमाग में चल रही उधेड़बुन और सुसाइडल टेंडेंसी स्क्रीन पर देखकर सीधे-सीधे समझ नहीं आती। दर्शक को खुद अनुमान लगाना पड़ता है। मसलन ये कि हां, शायद सूडानी लोगों की मदद के लिए लड़ रहा अश्वेत लीडर जब हैलीकॉप्टर क्रैश में मारा जाता है, तो सोफे पर बैठा सैम बौखला जाता है। अपने सूडानी कैंप के लिए बड़ी गाड़ी चाहिए, ताकि ज्यादा बच्चों को बचाया जा सके, पर कोई भी हैल्प करने से मना कर देता है। पैसे की किल्लत और ऊपर से मानवता की इस लड़ाई में एक बड़ा लीडर भी मारा गया और उसपर बेटी लिमोजीन खरीदने की बात कह रही है। फिर अपने दोस्त डॉनी को उसका बुरा भला कहना और टुकड़ों पे पल रहा कुत्ता कहना। कारोबार बेच, बीवी और बच्ची को रोता छोड़ चला जाना। पीछे से दोस्त डॉनी का ड्रग्स ओवरडोज और सैम के बुरा-भला कहने की वजह से मर जाना। वहां सूडान कैंप में पहुंचने पर भी बच्चों के प्रति वो प्यार अपनी आंखों में नहीं रख पाना। उस बागी को माथे में गोली मारना। हाथ पर गलती से सूप गिरा देने वाले अनाथ बच्चे को धक्का देना। ...ये सब विश्लेषण हमारे सामने जरूर होते हैं, पर सैम क्यों खुद को शूट कर लेना चाहता है। इसके कोई सीधे समझ आते इमोशन नहीं हैं। हमें सोचना पड़ता है। ये कि भगवान का उसकी मदद न करना और उसका सूडानी बच्चों की मदद न कर पाना उसे फ्रस्ट्रेट कर देता है।
# ये तो सैम के इमोशन की एक स्टेज है। शुरू में भी जैसे, एक युगांडा से आए हेल्पएड सज्जन को चर्च में सुनना और फिर एकदम से अफ्रीका जाने का मन बनाना, जबकि दर्शकों को पता नहीं चलता कि आखिर सैम इतना इम्प्रेस और प्रेरित, बाहर जाने के लिए क्यों हुआ है। इतना ही सपाट उसका बैप्टाइज होने का इरादा भी है। ये सपाट और पता न चलने वाली बात अच्छी भी है और बुरी भी। अच्छी इसलिए क्योंकि कुछ दर्शक स्मार्ट होते हैं, वो खुद समझना चाहते हैं और हीरो की लाइफ में कुछ भी अद्वितीय होता नहीं देखना चाहते। हर बार हीरो अपनी लाइफ में कोई बड़ा फैसला ले इसलिए किसी बड़े दैवीय चमत्कार का होना जरूरी नहीं होता। और वैसे भी असल लाइफ में ऐसा कहां होता है। होता भी है तो हम उसका विश्लेषण उतना हीरोइक तरीके से कहां करते हैं। चे गुवेरा की बायोपिक को ही लें। वो कोढिय़ों की मदद करने के लिए जाने को क्यों और कितना इच्छुक है ये उसी के दिमाग में है दर्शक को पता नहीं चलता। बस वो मोटरसाइकल जर्नी पर अपने दोस्त के साथ निकलता है। वैसे ही, यहां सैम का सूडान जाने का फैसला लेना भी उतना ही सिंपल सा हो सकता है। इंसानी सा। बुरा बस इतना ही है कि कहानी फिल्मी नहीं हो पाती।
# फिल्म खत्म होने के बाद क्रेडिट्स में असली सैम चिलर्स नजर आते हैं। उनकी, उनकी फैमिली की तस्वीरें, उनके सूडान और चर्च में प्रीच करते हुए वीडियो, उनकी पर्सनैलिटी और अंदाज नजर आता है। बहुत कम ही ऐसा होता है जब फिल्मी नायक से असली बायोग्राफिकल फिगर ज्यादा प्रभावी लगता है। यहां भी सैम फिल्म के सैम (जेरॉर्ड बटलर) से बिल्कुल भी कम नहीं लगते हैं।ये फिल्म सैम चिलर्स की लिखी स्मृतियों "अनॉदर मेन्स वॉर" पर बनाई गई है। सैम आज भी युगांडा, सूडान, दक्षिणी सूडान और पूर्वी अफ्रीका में अपने काम जारी रखे हुए हैं। तमाम विवादों के साथ।
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गजेंद्र सिंह भाटी