Saturday, March 31, 2012

बगैर सम्मोहित करने वाले निर्मल इरादों के फिल्में पसंद आतीं तो ब्लड मनी भी जरूर सराही जाती

फिल्म: ब्लड मनी
निर्देशकः विशाल महादकर
कास्टः कुणाल खेमू, अमृता पुरी, मनीष चौधरी
स्टार: दो, 2.0

केपटाउन में आए और त्रिनिटी डायमंड्स जॉइन किए कुणाल को कुछ ही दिन हुए हैं। वह बड़ा आदमी बनने की अपनी रफ्तार से खुश है। पर बीवी आरजू उसे हैंसल और ग्रेटा (जर्मन लोक किरदार) की कहानी सुनाती है। कि कैसे अपनी सौतेली मां के जुल्मों को सहते हुए ये दोनों नन्हे-मुन्ने भाई-बहन एक जंगल पहुंचते हैं। जहां उन्हें चॉकलेट और कन्फेक्शनरी का बना घर दिखता है। वह लालच में आ जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि उसी घर में एक चुड़ैल रहती है। उपेंद्र सिदये की लिखी 'ब्लड मनी’ की कहानी में हैंसल और ग्रैटा का ये बड़ा अच्छा संदर्भ है। कुणाल भी मुंबई की सड़कों की खाक छानने से लेकर साउथ अफ्रीका में एक महल जैसे बंगले तक पहुंचा है। हालांकि उसे नहीं पता कि इस लग्जरी के पीछे न जाने कितने लोगों का खून है और वह किस मुसीबत में फंस रहा है? डायरेक्टर विशाल महादकर की इस कोशिश की इज्जत ही मैं सिर्फ इस गलत रास्ते-सही रास्ते वाले संदेश की वजह से करूंगा। इसके अलावा फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है कि आप उसके टीवी पर या डीवीडी आने तक का इंतजार न कर सकें। कुणाल खेमू बुरे अदाकार नहीं हैं, पर अभी सिर्फ खुद के बूते फिल्म चला पाने के लायक नहीं हुए हैं। उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म आज भी 'जख्म ही है। अमृता पुरी स्वीट हैं बस, उनके अभिनय में कुछ नहीं है। मनीष चौधरी टीवी सीरीज 'पाउडर और 'रॉकेट सिंह जैसी फिल्म में बहुत प्रभावी लगे थे, पर यहां वह 'जूनियर’ और 'सुपर्ब’ जैसे शब्दों को बोलते हुए भी अमेरिकी एक्टर्स की फ्लॉप कॉपी लगते हैं। उनका अभिनय बहुत जड़वत हो गया है। गांभीर्य में भी कुछ घिसापन आ रहा है।

यहां कहानी बड़ी सीधी सी है। मुंबई का कुणाल (कुणाल खेमू) अपनी वाइफ आरजू (अमृता पुरी) के साथ केपटाउन आया है। एमबीए में डिस्टिंक्शन मिला था। अब त्रिनिटी डायमंड्स में जॉब लगी है, जिसका मालिक है जवेरी (मनीष चौधरी)। कुणाल को बड़ा आदमी बनना है इसलिए वह तेजी से आगे बढ़ रहा है। पर धीरे-धीरे उसकी शादीशुदा जिंदगी कड़वी होने लगती है और जानते-बूझते वह हीरों के इस गैरकानूनी धंधे में जानते हुए भी फंसता जाता है। वही हैंसल और ग्रेटा वाली बात है, चाहे वो चुड़ैल के घर में खड़े थे, पर उसके हाथ से चॉकलेट फिर भी खा रहे थे।

फिल्म में पूरी बहस इसी बात पर हो रही होती है कि या तो मुंबई में आप दो-दो नौकरियां करके जी लो अपने प्यार और खुशी के साथ या फिर केपटाउन में बड़े हीरा एक्सपोर्टर बन जाओ जिसके हाथ खून रंगे हैं। तो फटेहाल और आलीशान के बीच की बात थी। आखिर में जब कुणाल पहले ऑप्शन को चुनता है तो उसे किसी खूबसूरत (आलीशान) समंदर किनारे लकड़ी के बने घर में कुछ बच्चों और आरजू के साथ कहानी सुनाते हुए दिखाया जाता है। यानी उसे गरीब नहीं दिखाया गया है। तो ये एक बड़ा छल है। निर्देशक विशाल अगर फिल्म के अंत में कुछ ईमानदारी बरतते (या जो भी लोग ये क्लाइमैक्स तय करने की प्रक्रिया में शामिल थे) तो बेहतर होता। क्योंकि तब ये एक ठीक-ठाक संदेश देने वाली फिल्म हो सकती थी। ये भरोसा इसलिए पैदा होता है क्योंकि फिल्म में इसके संकेत है। एक सीन में जब आरजू की मैरिड लाइफ बिगड़ने लगती है तो वह कुणाल के दोस्त की वाइफ (मिया इवोन उयेदा) से मिलने जाती है। वहां जब दोनों की बात होती है तो वह बताती है कि पहले पहल उसे भी उन चीजों की आदत नहीं थी, पति के साथ उसका भी झगड़ा होता था, पर फिर मैंने आदत डाल ली। वह आरजू को कहती है कि ये लाइफस्टाइल आदत बन जाती है। इतनी कि कभी लौटकर मुंबई जाते हो, तो सड़क किनारे (देसी टूरिस्ट की तरह) बिसलेरी की बोतल लेकर घूमते हो, तुम्हें वहां गर्मी लगती है, पसीने की बदबू आती है और तुम लौटकर आना चाहते हो। यहां पटकथा में ये एहसास आता है कि हां, लिखने वाला कोई जमीनी हकीकत की समझ रखता है।

चंद डायलॉग
# बिजनेस ईमानदारी से नहीं होता। तुम मुझे एक सक्सेसफुल आदमी बताओ, मैं तुम्हें उसके दस गैरकानूनी काम बताता हूं।
# लोग ज्यादातर अच्छे होते हैं क्योंकि उन्हें बुरा बनने का मौका नहीं मिलता।
# मैं दुनिया को नहीं बदल सकता हूं, पर अपनी दुनिया बदल सकता हूं।

पॉइंट नोट करें मीलॉर्ड
# पहली जॉब में ही कुणाल को इतना बड़ा बंगला और टूरिस्ट की तरह अपनी वाइफ के साथ साउथ अफ्रीका में गाना गाने का वक्त कैसे मिल जाता है? ऐसा तो करोड़ों की कंपनियों के मालिकों के बंगले होते हैं।
# मनीष चौधरी के किरदार जवेरी को बाद में अंडरवल्र्ड डॉन जकारिया (मुस्लिम नाम) बताना इस धीमी फिल्म को तुरंत बासी और बेपरवाह बना देता है। साथ ही हम फिर उसी सांचे में बंधे ढर्रे में आ जाते हैं, जहां अंडरवल्र्ड डॉन बताने के लिए एक मुस्लिम सरनेस जोड़ा और काम बन गया। दर्शक मान गए कि हां भई जकारिया है तो स्वीकार कर लेते हैं कि कोई डॉन होगा।
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गजेंद्र सिंह भाटी