Wednesday, February 12, 2014

मानो मत, जानोः “रब्बा हुण की करिये” ...बंटवारे की टीस

हॉली और बॉली वुडों ने दावा किया कि दुनिया बस वही है जो उन्होंने दिखाई... बहुत बड़ा झूठ बोला, क्योंकि दुनिया तो वह नहीं है। दुनिया का सच तो हिलाने, हैराने, हड़बड़ाने और होश में लाने वाला है, और उसे दस्तावेज़ किया तो सिर्फ डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों ने। “मानो मत, जानो” ऐसी ही एक श्रंखला है जिसमें भारत और विश्व की अऩूठे धरातल वाली अविश्वसनीय और परिवर्तनकारी डॉक्युमेंट्रीज पढ़ व देख सकेंगे।

 Documentary. .Thus Departed Our Neighbours (2007), by Ajay Bhardwaj.

लाल सिंह दिल नजर आते हैं, शुरू में। पहली डॉक्युमेंट्री में वे इस्लाम के प्रति अपने अनूठे नेह और दलितों के साथ मुस्लिमों को भी सदियों के व्यवस्थागत-सामाजिक शोषण का पीड़ित बताते हैं। यहां उनकी संक्षिप्त झलक मिलती है। वे उर्दू की बात करते हैं। तेजी से दौड़ता और फिर लौटकर न आने वाला दृश्य उनका कहा सिर्फ इतना ही सुनने देता है, “...पंजाबी दी ओ तु पख्ख है। उर्दू, अरबी-पंजाबी नाळ इ मिळके बणया है। ओ अपणी लैंगवेज है। आप्पां अपणे पांडे बार सिट सिरदे हैं, वी साड्डे नी है साड्डे नी है। हैं साड्डे...। (उर्दू पंजाबी का ही तो हिस्सा है। ये अरबी और पंजाबी से ही तो मिलकर बनी है। ये हमारी ही भाषा है। हम अपने ही असर को बाहर फेंक रहे हैं कि ...हमारे नहीं हैं... ये हमारी ही है।)”

Pro. Karam Singh ji, in a still.
फिर इस डॉक्युमेंट्री के सबसे अहम पात्र प्रो. करम सिंह चौहान आते हैं जो बठिंडा, पंजाब से हैं। वे मुझे देश के सबसे आदर्श व्यक्तियों में से लगते हैं। जैसे हम में से बहुतों ने अपने गांवों में देखें होंगे। मख़मली ज़बान वाले, विनम्रता की प्रतिमूर्ति, बेहद सहनशील, अनुभवों से समृद्ध, हर किसी के लिए रब से प्रार्थना करने वाले, समाज की समग्र भलाई की बात कहने वाले और उन्हें तक माफ कर देने वाले जो बंटवारे के क़ातिल थे। सिर्फ ‘रब्बा हुण की करिये’ की ही नहीं, अजय भारद्वाज की तीनों डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों की बड़ी ख़ासियत, ऐसे पात्र हैं। हर फ़िल्म में ऐसे एक-दो, एक-दो लोग हैं जिन्हें कैमरे पर लाना उपलब्धि है। इन सलवटी चेहरों के एक-एक शब्द को सुनते हुए कलेजा ठंडा होता है, मौजूदा दौर की बदहवासी जाती है, समाजी पागलपन का नशा टूटता है और समाज का सही पर्याय दिखता है। अगले 10-15 साल बाद ऐसे विरले बुजुर्ग सिर्फ दंतकथाओं में होंगे। मैं सिर्फ करम सिंह जी को सुनने के लिए ‘रब्बा हुण की करिये’ को पूरी उम्र देख सकता हूं। वे हमें तमाम तरह की अकड़ की जकड़ से निकालते हैं। उन जैसे लोग हमारे लिए मानवता का संदर्भ बिंदु हैं।

करम सिंह जी उर्दू के बारे में बात जारी रखते हुए पंजाब के मानसा जिले की बात करते हैं, “कुछ महीने बाद (विभाजन के) मैं मानसा के रेलवे स्टेशन गया। वहां जाकर क्या देखा, कि वहां जो उर्दू में मानसा लिखा हुआ था, वो नाबूद था। बड़ा दुख हुआ। मैंने सोचा, इन्होंने तो जिन्ना साहब को सच्चा कर दिया, जिन्होंने कहा था कि हम आप लोगों के साथ क्या रहें, आप तो हमारी भाषा को भी नहीं रहने देंगे”। अगले दृश्य में उधम सिंह का 1940 में लिखा ख़त पढ़ा जा रहा है। पास ही में पहली फ़िल्म के पात्र बाबा भगत सिंह बिल्गा बैठे हैं। जिक्र हो रहा है कि ख़त में कैसे उधम सिंह ने अपने लंदन में ब्रिक्सटन जेल के अधिकारी से कहा कि उनका नाम न बदला जाए जो मोहम्मद सिंह आजाद है। बिल्गा बताते हैं कि उधम को जेल में हीर पढ़ना बहुत पसंद था और खासकर हीर व क़ाज़ी के संवाद। फिर हम जालंधर के लोकप्रिय गायक पूरण शाहकोटी की आवाज सुनते हैं जिन्होंने अपने गांव शाहकोट के नाम को अपना नाम बना लिया। वे हीर गा रहे हैं। कहते हैं कि वारिस की हीर और सूफीयत से पंजाब का गहरा ताल्लुक है और आज भी दोनों पंजाबों का सभ्याचार एक ही है। मसलन, हीर। जो एक ही तरह से गाई जाती है। आप सरहद के किसी ओर वाले पंजाब में इसे सुनकर फर्क नहीं बता सकते। पूरण शाहकोटी नकोदर दरबार के अपने मुर्शिद (गुरू/स्वामी) बाबा लाडी शाह, बाबा मुराद शाह का जिक्र करते हैं, जिनके लिए गाने पर उन्हें तसव्वुर मिलता है। यानी सवाल खड़ा होता है कि आपने किसको अलग कर दिया? क्या आप वाकई में अलग कर पाए? क्योंकि ये तो उन्हें आज भी अपना ही मानते हैं। खैर, हम उनसे हीर का अनूठा हिस्सा सुनते हैं। वो हिस्सा जब हीर अपनी मां को गाते हुए पूछती है, “...दो रोट्टियां इक गंडणा नी मा ए, पाली रखणा कि ना ए”। सुनकर नतमस्तक होते हैं। हीर के मायने बड़े गहरे हैं जो सामाजिक टैबू, सांप्रदायिकता और बैर का विरोध करने वाली अजर-अमर छवि है। जैसे मीरा अपने वक्त में थीं। वो अपनी मां से कहती है कि वो बस दो रोटियां और एक प्याज लेगा, इतनी तनख़्वाह में ही उसे अपने जानवर चराने के लिए पाली रख ले मां। (किसी भी तरह से वो रांझे के करीब होना चाहती है)। वाकई तसव्वुर होता है।

इसके बाद करम सिंह जी रात के अंधियारे में बात करना शुरू करते हैं। वे शुरू करते हैं तुलसीदास जी की पंक्ति से, “पैली बणी प्रारब्ध, पाछे बणा शरीर...” यानी पहले आपकी नियति बनी थी, उसके बाद शरीर बना। वे बताते हैं कि उनके गांव में कोई स्कूल नहीं था, कोई पढ़ने का उपाय नहीं था, दो कोस दूर स्कूल था। फिर लुधियाना से करम इलाही नाम के एक पटवारी तबादला होकर उनके गांव आए। उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी थी, पर उनके कोई बच्चा नहीं था। उनका नाम शम्स-उल-निसा बेग़म चुग़ताई था। उन्होंने उन्हें करमिया कहकर बुलाना, पढ़ाना और स्नेह देना शुरू किया। उन्हीं की बदौलत वे पढ़ पाए। बाद में उन्होंने लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज से 1947 में फ़ारसी में एम.ए. की। करम सिंह द्रवित हो कहते हैं, “बीब्बी जी ने मैनूं बड़ा ही मोह दीत्ता, मिसेज करम इलाही पटवारी ने। मैनूं पार्टिशन दा ए बड़ा दुख औन्दा ए। वी मैं एहे जे बंदेया कौळों बिछोड़या गया”।

फिर हम हनीफ मोहम्मद से मिलते हैं। वे अटालां गांव के हैं जो समराला-खन्ना रोड पर स्थित है। अहमदगढ़ के जसविंदर सिंह धालीवाल हैं। ये दोनों विभाजन के वक्त के क़त्ल-ए-आम के चश्मदीद रहे हैं। हनीफ बच्चे थे और उन्होंने वो वक्त भी देखा जब उनके गांव की गली में पैर रखने को जगह नहीं बची थी, बस चारों ओर लाशें और ख़ून था। जसविंदर ने अपनी छत से खड़े होकर सामने से गुजरते शरणार्थियों के काफिले देखे। क़त्ल होते देखे। वो दौर जब मांओं ने अपनी जान बचाने के लिए अपने बच्चे पीछे छोड़ दिए। करम सिंह जी भी उस दौर के नरसंहार के किस्से बताते हैं। ये भी मालूम चलता है कि, वो लोग जिन्होंने निर्दोषों की बेदर्दी से जान ली और बाद में अपनी क़ौम से शाबाशियां पाईं, बहुत बुरी मौत मरे। तड़प-तड़प कर, धीरे-धीरे।

विभाजन के दौर की ये सीधी कहानियां हैं जो इतनी करीब से पहले नहीं सुनाई गईं। ‘उठ गए गवांडो यार, रब्बा हुण की करिये...” वो पंक्ति है जो बींध जाती है। आप पश्चिमी पंजाब के आज के लोगों के मन में तब सरहद खींच उधर कर दिए गए पड़ोसियों, दोस्तों के लिए अपार प्रेम देखते हैं। ये गीत रातों को और स्याह बनाता है, मन करता है बस सुनते रहें। कि, उन्हें याद करने को और रब से शिकायत करने को, मुझसे कोई नहीं छीन सकता।

डॉक्युमेंट्री के आखिर में करम सिंह जी जो कहते हैं, वो हमारी सामूहिक प्रार्थना है। 1947 की मानवीय त्रासदी के प्रति। बर्बरता से, नृशंसता से मार दिए गए दूसरी क़ौम के हमारे ही भाइयों, बहनों, रिश्तेदारों से क्षमा-याचना है। उनकी रूहों की शांति के लिए। जिन्होंने क्रूरता की हदें पार की, उनके लिए भी। उनकी रूहों को भी नेक रास्ते लाने के लिए। वे क़लमा पढ़ते हैं, हम भी...

“ मज़लूमों, थोड्डा
थोड्डा
इल्ज़ाना देण वाला
अल्ला-पाक़ ए
रहमान-ओ-रहीम ए
ओस ने थोड्डा
होया नुकसान
थ्वानूं देणा ए
ते मैं दुआ करदा हां,
परमात्मा थ्वानूं जन्नत बख़्शे
ओन्ना मूर्खा नूं
ओन्ना पूलयां नूं वी
रब्ब
ओन्ना दीयां रूहां नूं
किसे पले रा पावे
किसे नेक रा पावे
ओन्ना उत्ते तेरी मेहरबानी होवे
इनसान आख़िर नूं
तेरा इ रूप ए
तेरा इ बंदा ए
इनसान ने इनसान उत्ते कहर करेया
जिदे उत्ते इनसान सदा रौंदा रहू
जेड़ा इनसानियत नूं समझदा ए
या अल्ला
तेरी मेहर…”

(कृपया ajayunmukt@gmail.com पर संपर्क करके अजय भारद्वाज से उनकी पंजाबी त्रयी की डीवीडी जरूर मंगवाएं, अपनी विषय-वस्तु के लिहाज से वो अमूल्य है)

“Thus Departed Our Neighbors” - Watch an extended trailer here:


While India won her independence from the British rule in 1947, the north western province of Punjab was divided into two. The Muslim majority areas of West Punjab became part of Pakistan, and the Hindu and Sikh majority areas of East Punjab remained with, the now divided, India. The truncated Punjab bore scars of large-scale killings as each was being cleansed of their minorities. Sixty years on, ‘Rabba Hun Kee Kariye’ trails this shared history divided by the knife. Located in the Indian Punjab where people fondly remember the bonding with their Muslim neighbours and vividly recall its betrayal. It excavates how the personal and informal negotiated with the organised violence of genocide. In village after village, people recount what life had in store for those who participated in the killings and looting. Periodically, the accumulated guilt of a witness or a bystander, surfaces, sometimes discernible in their subconscious, other times visible in the film. Without rancour and with great pain a generation unburdens its heart, hoping this never happens again.

(Users in India and International institutions, can contact Ajay Bhardwaj at ajayunmukt@gmail.com for the DVDs (English subtitles). You can join his facebook page to keep updated of his documentary screenings in a city near you.)