Wednesday, January 9, 2013

बाहें जिना दी पकड़िए, सिर दीजे, बाहें न छोड़िए

उनके जाने के कुछ ही घंटों में कुछ लिखा था। बींध दिए गए काळजे से, बींध दी गई सोचने की इंद्रीय से और थोप दिए गए उस अवाकपन से जो 2012 में बहुत बार आया। दुख हुआ। बहुत दुख हुआ। पर उन शब्दों को यहां बांटने से कतराता रहा। कतराने की वजह जो हमेशा रहती ही है, कि शब्द बेबस होते हैं, जहरीले होते हैं, प्रदूषक होते हैं। फिल्में देखने के अनुभव व्यक्तिगत होते हैं और बेशकीमती होते हैं, उन्हें शब्दों से कभी दूसरे को व्यक्त नहीं किया जा सकता है। जब किया भी जाता है तो आंशिक हो पाता है। उनमें छिपे विचारों पर परिचर्चा कर सकते हैं, पर भावों पर नहीं। यश चोपड़ा भाव थे। प्यार के, पंजाबियत के, दोस्ती के, दर्द के, दुर्दिन के, जलसे के, जिंदगी जीने के, क़िस्सागोई के, कर्मठता के, संगीत के, सपनों के, साथ के, ऐश्वर्य के, आजादी के, खुशी के, खतरे के, शुरुआत के और अंत के। कुछेक विषयपरक आलोचनाएं हैं जो फिर कभी, फिलहाल कुछ वो जिसके लिए मैं उन्हें याद रखूंगा, संभवतः हम सभी।
स्मृतिशेषः यश चोपड़ा 1932 - 2012
 “ऐसा कुछ कर पाएं,
 यादों में बस जाएं,
 सदियों जहान में हो  चर्चा हमारा
 दिल करता,
 ओ यारा दिलदारा मेरा दिल करता...”
‘आदमी और इंसान’ 1969 में आई थी। बतौर डायरेक्टर यश चोपड़ा की चौथी फिल्म। साहिर लुधियानवी का लिखा और महेंद्र कपूर का गाया ये गाना उनकी जिंदगी का सार भी है और उनकी तमाम फिल्मों की काव्यात्मक थीम भी। इसमें नाचते सैनिकों को देख और उनके लफ़्जों को सुन कोई भाव विह्अल न हो, आज भी ऐसा नहीं हो सकता। इसमें सब है। देशभक्ति, कर्मठता, किसी गोरी की कलाई थामने की ख्वाहिश, जीने की खुशी, नाचने-गाने का पंजाबी रंग और कुछ कर गुजरने का जज़्बा। देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की उनकी परिभाषा सबसे पहले उनकी दो शुरुआती फिल्में थीं। 1959 में आई उनकी पहली ही फिल्म ‘धूल के फूल’ में जंगल में छोड़ दिए गए एक हिंदू नाजायज बच्चे को एक मुस्लिम अब्दुल रशीद पालता है। उसे गाकर सुनाता है “तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा”। यकीनन, इन नैतिक शिक्षाओं को अपनी फिल्मों में आज हम बहुत मिस कर रहे हैं। उनकी दूसरी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ में बंटवारे का दर्द था, वही जो यश खुद झेल चुके थे। दिल्ली के दो सद्भाव से रहने वाले हिंदु-मुस्लिम परिवारों की कहानी थी। यहां से आगे ‘वीर-जारा’ तक उन्होंने कोई विशुद्ध मैसेज वाली फिल्में नहीं बनाईं। जो भी बनाईं थोड़ी भलमनसाहत, बाकी मनोरंजन की चाशनी और सुरीले गुनगुनाते डायलॉग्स में डुबोकर बनाई, पर सब में उनका दिल जरूर होता था। फिर उनकी फिल्मों की थीम प्यार, किस्मत, गरीबी, अमीरी, नैतिकता, आधुनिकता, रिश्ते-नाते, विरसे और जिंदगी जैसे दार्शनिकता भरे विषयों पर चली गईं।

लाहौर में जन्मे इस लड़के को जब 19 की उम्र में घरवाले जालंधर से इंजीनियर बनने भेज रहे थे तब उसके शरीर में दिल और पोएट्री दो ही चीजें धड़क रही थीं। बाद में वो पोएट्री कहानियां बन गईं और बड़े भाई बलदेवराज चोपड़ा की शार्गिदी में सीखी फिल्ममेकिंग आगे बढ़ने का जरिया। मूलमंत्र एक ही था, ‘जो काम जिंदगी दे वो दिल लगाकर करते जाओ’। वही जज़्बा जो हर मेहनती, जुझारू और उसूलों वाले हिंदुस्तानी में पराए मुल्क जाकर सफल हो जाने से पहले होता है। आदित्य चोपड़ा की ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में जिस चौधरी बलदेव सिंह को हम देखते हैं, वह असल में उनके पिता यश चोपड़ा की छवि ही लगती है। सुबह-सवेरे लंदन के भीगे आसमान तले, भीगी सड़कों पर हाथ में छड़ी और जेब में कबूतरों के लिए दाने लिए जा रहे बलदेव सिंह की पंजाब को लेकर दिल में उठती हूक और इस किरदार को निभा रहे अमरीश पुरी की चौड़ी जॉ-लाइन, दोनों यश चोपड़ा की याद दिलाते हैं।

‘ए मेरी ज़ोहरा-जबीं’ (वक्त) से लेकर ‘चल्ला रौंदा फिरे’ और ‘हीर’ (जब तक है जान, आखिरी फिल्म) तक अलग-अलग रूपों में वह हिंदुस्तानी सिनेमा में पंजाबियत स्थापित करते रहे। उनकी फिल्मों में कोहली, कपूर, चौधरी, चोपड़ा, खन्ना, मेहरा, मल्होत्रा, गुप्ता, वर्मा, सक्सेना, लाला, खान और सिंह जैसे सरनेम ज्यादा रहे। 1973 में आई उन्हीं की फिल्म ‘दाग़’ में नायिका गाती हैं, “यार ही मेरा कपड़ा लत्ता, यार ही मेरा गहना। यार मिले तो इज्जत समझूं कंजरी बनकर रहना। नी मैं यार मनाणा नी चाहे लोग बोलियां बोलें”। इश्क की तड़पन यहां भी पंजाबी थाप और शब्दों के बिना पूरी नहीं होती। यशराज प्रॉडक्शंस तले बनी फिल्मों में तो ‘ऐंवेई ऐंवेई’ (बैंड बाजा बारात) पंजाब आता-जाता रहा।

आम राय के उलट यश चोपड़ा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर विदेशी रीमेक और साहित्यिक कृतियों में भी रुचि लेते थे। ‘काला पत्थर’ जोसेफ कॉनरेड के नॉवेल ‘लॉर्ड जिम’ से प्रेरित थी। ‘दाग़’ थॉमस हार्डी के नॉवेल ‘द मेयर ऑफ कास्टरब्रिज’ पर आधारित थी। ‘इत्तेफाक’ ब्रिटिश फिल्म ‘साइनपोस्ट टु मर्डर’ की रीमेक थी। ‘धर्मपुत्र’ आचार्य चतुरसेन से नॉवेल पर बनी थी। मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक ‘मशाल’ वसंत कानेटकर के मराठी प्ले ‘अश्रूंची झाली फुले’ पर आधारित थी।

प्यार में विरह और त्याग के सबसे पुराने रूल को उन्होंने बहुत बरता। ‘वीर-जारा’, ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’ और ‘चांदनी’ देखें। उनके टॉपिक बोल्ड रहे। हालांकि वक्त के साथ उनके किरदारों के प्यार में दुश्वारियां कम होती गईं। उनकी फिल्मों में पीढ़ियां होती थीं, जॉइंट फैमिलीज होती थीं, बहुत सारी फैमिलीज होती थीं। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के साथ उनकी ‘दीवार’ को चाहे स्टैंड अप कॉमेडियंस ने हल्का करने की कोशिश की हो, पर ये फिल्म आज भी एंग्री यंग मैन वाली फिल्मों में ‘मशाल’ के साथ शीर्ष पर बनी हुई है। ‘मशाल’ में अख़बार चलाने वाले भले इंसान विनोद कुमार बनते हैं दिलीप कुमार। उनका एक सीन शायद यश चोपड़ा के निर्देशन वाले तमाम श्रेष्ठ सीन्स में से एक है। आधी रात को, बेघर, सड़क पर पति संग ठोकर खा रही सुधा (वहीदा रहमान) के पेट में दर्द शुरू हो जाता है। वह फुटपाथ पर गिरी दर्द में कराह रही है और लाचार, गिड़गिड़ाते, हर संभव तरीके से मदद मांगते विनोद इधर-उधर दौड़ रहे हैं। दरवाज़ों, दुकानों, खिड़कियों को पीट रहे हैं, हर गुजर रही गाड़ी के आगे मिन्नतें कर रहे हैं (पर कोई नहीं रुक रहा) ...
“अरे कोई आओ,
अरे देखो बेचारी मर रही है,
अरे मर जाएगी बचा लो रे।
गाड़ी रोको...
ऐ भाई साहब गाड़ी रोक दो,
गाड़ी रोको भाई साहब।
ऐ भाई साहब...
मेरी बीवी की हालत बहुत खराब है,
उसको... उसको अस्पताल पहुंचाना है।
भाई साहब वो मर जाएगी,
आपके बच्चे जिएं,
हमारी इत्ती मदद कर दो
उसको अस्पताल पहुंचा दो भाई साहब,
भाई साहब आपके बच्चे जीएं,
भाई गाड़ी रोको...
ए भाई गाड़ी रोक दो”।

आपको रुला देता ये पूरा दृश्य रौंगटे खड़े करता है। बेहद। एहसास करवाता है कि क्यों आज तक दिलीप कुमार अभिनय के भारतीय आकाश में सबसे चमकीले तारे हैं। दृश्य के रोम-रोम में प्राकृतिक भाव हैं, उन्हें लिखा और फिल्माया उसी दर्द को महसूस करते हुए गया है। पीड़ा के अलावा यश चोपड़ा की ऐसी ही आत्मानुभूति रोमैंस के मोर्चे पर भी दिखती है। चाहे ‘लम्हे’ के अधेड़ वीरेंद्र और उम्र में उससे आधी पूजा के बीच का अपनी परिभाषा ढूंढता अस्थिर प्यार हो या ‘चांदनी’ के रोहित-चांदनी का रोमैंटिक-काव्यात्मक ख़तों से भरा गर्मजोश प्यार। जब रोहित की चिट्ठी आती है तो वीणा के झनझनाते तारों वाले बैकग्राउंड म्यूजिक और पीले फूलों वाले बगीचे में लेटकर चांदनी पढ़ना शुरू करती है... रोहित ने लिखा है...
चांदनी,
तुम्हें हवा का झोंका कहूं
कि वक्त की आरजू,
दिल की धड़कन कहूं
कि सांसों की खुशबू।
तुम्हें याद करता हूं
तो फूल खिल जाते हैं,
सुबह होती है तो लगता है...
तुम अपनी जुल्फें शबनम में भिगो रही हो,
और मैं, तुम्हारी आंखों को चूम रहा हूं।
सुनहरी धूप में लगता है
जैसे चांदनी जमीन पे उतर आई है,
शाम का ढलता सूरज
तुम्हें चंपई रंग के फूल पहना रहा है,
और तुम्हारी खुशबू से
मेरा बदन महक रहा है।
जब रात अपना आंचल फैलाती है...
तुम्हारी कसम,
तुम बहुत याद आती हो।
पूनम का चांद
अपनी गर्दिश भूलकर,
ठहरा हुआ तुम्हारा रूप देख रहा है,
मैं आंखें बंद कर लेता हूं...
और चांदनी मेरे दिल में उतर आती है।
तुम्हारा, सिर्फ तुम्हारा
- रोहित

और फिर ख़त पढ़कर फूलों सी शरमाई, खिली, मुस्काई चांदनी लिखती है...
 रोहित,
क्या लिखूं?
वक्त जैसे ठहर गया है।
हवा, खुशबू, रात...
सब सांस थामे इस इंतजार में हैं
कि मैं कुछ लिखूं,
पर दिल की बात लफ्जों में कैसे आएगी।
रोहित, तुम्हारी पसंद की सब चीजें हैं,
मोगई के फूल,
मुस्कुराती शमा
और तुम्हारी चांदनी।
काश, तुम यहां होते!
मगर तुम कैसे होते?
मगर तुम हो तो सही
मेरी सांसों में,
मेरे दिल में,
मेरी धड़कन में।

चांदनी-रोहित की ये बातें यश चोपड़ा की फिल्मों में लफ़्जों की अति-भावुकता (जिनका अति होना जरूरी भी था) का एक बेहतरीन उदाहरण है। भले ही आप उन पंक्तियों के भीतर तक न घुसें पर आपके बाहर-बाहर से गुजरते हुए भी ये पोएट्री आपको सीट पर पीछे की ओर सहला जाती हैं। और वह खुद भी मानते थे कि उनकी हर फिल्म असल में महज पोएट्री ही होती थी। ‘कभी-कभी’, ‘वीर-जारा’, ‘चांदनी’ और ‘जब तक है जान’ में ये सीधे तौर पर थी तो बाकी फिल्मों में संवादों और गानों में। अगर सकारात्मक लिहाज से लें तो यश चोपड़ा बड़े सेंटिमेंटल आदमी थे, जो एक डायरेक्टर को होना ही चाहिए। उनका संगीत भी वैसा ही रहा। दिल से बना, सीधा-सपट और मजबूत। एन दत्ता, रवि, खय्याम से लेकर उत्तम सिंह तक सभी उनकी फिल्मों का म्यूजिक दे गए पर ज्यादा काम उनका शास्त्रीय तासीर वाले शिव-हरि की जोड़ी के साथ ही निकला। यश की फिल्मों ने बहुत ही खूबसूरत, कर्णप्रिय गाने दिए पर मुझे तसल्ली देता और यश चोपड़ा को भी कुछ बयां करता एक ही रहा। 1981 में आई ‘सिलसिला’ में भाई हरबंस सिंह जगाधरी का गाया संगीत ‘बाहें जिना दी पकड़िए’... अद्भुत। इस संगीत का भाव यश चोपड़ा की फिल्मों में सर्वत्र है। कलेजा निचोड़ देता, गीला, छलछलाता, तांतेदार और दिल से संचालित होने वाला भाव।

उन्होंने अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान को उनकी जिंदगी का ऊंचा मुकाम दिया। उन्होंने साइकिल पर अपने पूरे परिवार को ढोने वाले दर्शक को सूरजमुखी के फूलों में रोमैंस की सपनीली तस्वीर दिखाई। हालांकि, वो दर्शक कभी ठीक वैसा काव्यात्मक रोमैंस कर न सका, वह स्विट्जरलैंड (ये आलोचनात्मक पहलू रहेगा कि बहुतों ने स्विट्जरलैंड जाने को अपना ध्येय बनाया भी ) जा न सका, पर इन फिल्मों से उसे विदेशों का एक सिनेमाई आइडिया हुआ। मनोरंजन के लिहाज से ये ठीक-ठीक था, जागरूक करने के लिहाज से नहीं। यश चोपड़ा ने हमेशा ईमानदार दिल से फिल्में बनाई जो तकनीकी तौर पर बेदाग होती थीं जो सदा धड़कती थीं।

मुझे लगता है कि वक्त से साथ उनकी फिल्मों का कद बढ़ेगा। उनकी चल्ले वाली बड़ी क्लीन-सघन लाइफ में फिल्मों के इतर असल जिंदगी का एक बहुत बड़ा सबक है। उस दौर पर जब हम मिनट-मिनट में फुटेज न मिलने पर, लाइक्स न मिलने पर और अपने दायरों में सेलेब न बन पाने पर निराश हो जाते हैं, हार से जाते हैं, यश चोपड़ा अपनी लाइफ की ऐसी कहानी देकर जाते हैं जो कर्म करने से बनती गई। न हर कदम पर सफलता के लिए अतिरिक्त प्रयास करने थे, न आगे बढ़ने के लिए ताकत लगानी थी... बस एक काम में मन लग गया, उसे करते चले गए, बिना परिणाम की प्रतीक्षा के... और बात बन गई। एक भरा-पूरा जीवन और कार्य-संग्रह जमा हो गया। जो भी ऐसा मनोबल पाना चाहते हैं और ऐसी प्रेरक कहानी सुनना चाहते हैं वो ये साक्षात्कार देख सकते हैं। मृत्यु से कुछ वक्त पहले उन्होंने शुरू से लेकर आखिर तक जीवन का हर पड़ाव लोगों से बांटा।

 ...इधर-उधर के बीच केवल एक यश चोपड़ा नजर आते हैं, जो ऊर्जा देते हैं, होंसला देते हैं और याद आते हैं।
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गजेंद्र सिंह भाटी