Saturday, April 28, 2012

'हॉलीवुड एंडिंग' के वैल और 'तेज' के प्रियदर्शनः इनके ब्लॉकबस्टर प्रोजेक्ट के 'पहले और बाद' कितने समान

फिल्मः तेज
निर्देशकः प्रियदर्शन
कास्टः बोमन ईरानी, अनिल कपूर, अजय देवगन, मोहनलाल, समीरा रेड्डी, जायद खान, कंगना रनौत
स्टारः डेढ़, 1.5
नोटः पढ़ने में सब्र रखें, खासतौर पर शुरू में


You know who would be perfect to direct this...
...not that I relish the idea of working with him, but my ex-husband.

Val?

He's perfect for this material.

She's right. It's his kind of story.

I love Val, but with all due respect, he's a raving, incompetent psychotic.

He's not incompetent.

They should lock him up and throw away the key. Don't take that the wrong way.
We'll wind up $ ... million over budget and no picture to boot.
I did a picture with him at Firestone. He never fini...had a nervous breakdown.

He was under a lot of stress. We'd just broken up.

Honey, he was fired off a picture here at Galaxie before I took over.
They said his demands were outrageous.
The light had to be perfect. The sun had to be just right.
He demanded they replace the leading lady.
He wanted to reshoot dailies, fire the cameraman.
He got shingles. They shut down the picture and found another director.

You don't have to tell me.
I was married to him then. But that was years ago.

His best pictures were years ago. Then he became an artiste.

I am the last person to defend that craziness, because it drove me nuts.
But Val cares about movies. He was born to do this material.

Ellie, we're talking about shingles, headaches. Why open a can of worms?

He's mellowed, I'm telling you.
Who better to direct this? New York's in his marrow.
The opening scene of Woody Allen’s masterly made piece “Hollywood Ending”. The central character is Val played by Woody himself, a film director now reduced to directing cheap commercials. Val’s former wife (Tea Leoni) and her current boyfriend (Treat Williams) who’s a studio head, are talking about their next big budget blockbuster project.

2002 में आई वूडी एलन की फिल्म हॉलीवुड एंडिंग। वैल और उसकी फिल्ममेकिंग की कहानी। कभी शानदार फिल्में बनाने वाला वैल (वूडी) आज सस्ते विज्ञापन बना रहा है। अपनी जवान गर्लफ्रेंड और बाकी खर्चों के लिए। उसके भीतर बैठे फिल्मकार की धार को जंग लग चुकी है। ये फिल्म का पहला सीन है। वैल की पूर्व बीवी और उसे वैल से चुराने और जल्द शादी करने वाला बड़े हॉलीवुड स्टूडियो का मालिक इस सीन में हैं। दोनों अपनी न्यू यॉर्क की पृष्ठभूमि वाली अगली बड़े बजट वाली ब्लॉकबस्टर फिल्म के लिए निर्देशक के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और तभी ये बात होती है।

यहां एंट्री करवाते हैं प्रियदर्शन की। कभी प्रियन ने मास्टरपीस बनाए थे। मलयालम में बोइंग बोइंगऔर काला पानीजैसी दर्जनों फिल्में। हिंदी में विरासत, डोली सजा के रखना, मुस्कराहट’, हेरा फेरी और गर्दिश जैसी प्यारी कहानियां। 2007 में ही आई थी कांचीवरम, राष्ट्रीय पुरस्कार जीतते हुए, तमाम कसर पूरी करते हुए। मगर अब तेजतक आते-आते भावों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ने लगी है। तो जो बातचीत वैल को लेकर उसकी वाइफ और स्टूडियो मालिक कर रहे हैं, उसमें हम प्रियन को रखते हैं और हॉलीवुड फिल्म प्रोजेक्ट की जगह ‘तेज’ को... तो ये ओपनिंग सीन बनता है...

वह डायरेक्ट करने के लिए परफेक्ट रहेगा...
कौन प्रियन?
इस मटीरियल के लिए वो परफैक्ट है.
हां, ये उसके टाइप की स्टोरी है.
मैं उसे पसंद करता हूं, पर पूरे सम्मान के साथ ये भी मानता हूं कि वह सनकी और अक्षम पागल है.
वह अक्षम नहीं है.
गलत मत मानना, पर उसे तो ताले में बंद करके चाबी खाड़ी में फेंक देनी चाहिए.
हम लोग करोड़ों लगा देंगे और रिलीज करने के लिए कोई फिल्म ही नहीं होगी.
मैंने उसके साथ एक फिल्म की थी... उससे पूरी ही नहीं हो पाई, उल्टे नर्वस ब्रेकडाउन और हो गया (यहां जाहिर है कि प्रियदर्शन फिल्में अधूरी नहीं छोड़ते, हां ज्यादा अपनी ही मलयाली फिल्मों का हिंदी रीमेक बनाते रहते हैं। अब नर्वस ब्रेकडाउन कितना होता है पता नहीं)
तब वो बहुत ज्यादा प्रेशर में था, हमारा तलाक हुआ ही था. (भूल जाइए, आगे बढ़ें)
हनी, मैंने गैलेक्सी (प्रोड्यूसर रतन जैन की कंपनी को रख लेते हैं गैलेक्सी की बजाय यहां) स्टूडियो को खरीदा उससे पहले ही उससे एक फिल्म वापिस ले ली गई थी. (जाहिर है ऐसा कम ही हुआ होगा)
उन्होंने कहा कि उसकी मांगें पागलों जैसी थीं.
रोशनी परफेक्ट होनी चाहिए, सूरज बस बिल्कुल सही होना चाहिए. उसने तो मांग की कि फिल्म की हीरोइन को बदल दो. वह नॉर्मल से शॉट को फिर से फिल्माना चाहता था, कैमरामैन को निकाल देना चाहता था. फिर उसे दाद हो गई. प्रोड्यूसर्स ने फिल्म बंद कर दी और दूसरा डायरेक्टर ढूंढा.
तुम्हें ये सब मुझसे कहने की जरूरत नहीं है. मैं उससे शादीशुदा तब थी. और ये बरसों पहले की बात है. ( लागू करें)
उसकी बेस्ट फिल्में सालों पहले थीं. फिर तो वह आर्टिस्ट बन गया.
देखो, उसके पागलपन की सफाई देने वाली मैं आखिरी इंसान हूं, क्योंकि उससे मेरा भी दिमाग खराब हो गया था. पर प्रियन फिल्मों की बहुत चिंता करता है. हमारी नई फिल्म को जो मटीरियल है, वह उसे ही करने के लिए जन्मा है.
ऐली (हम दर्शक) हम दाद और सिर दर्द की टेंशन की बात कर रहे हैं, उसको लेने का मतलब कीड़ों-मकोड़ों से भरा ढोल खोलना है, तुम ऐसा क्यों करना चाहती हो.
मैं कह रही हूं न कि वह अब विनम्र हो चुका है. फिर उससे बेहतर कौन है इस फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए. न्यू यॉर्क तो (यहां लंदन) उसकी अस्थिमज्जा में बहता है.

वैल को आखिरकार वो फिल्म मिली और प्रियन को ‘तेज’। पर बाद में हॉलीवुड एंडिंग में कुछ यूं होता है कि जैसे-तैसे शूटिंग शुरू करने के बाद वैल की आंखों की रोशनी अल्पकाल के लिए चली जाती है। पर यह बात वह अपनी पूर्व बीवी और उसके होने वाले प्रोड्यूसर पति को नहीं बताना चाहता इसलिए अंदाज से ही फिल्म शूट करता रहता है। वो सीन वहां, ये यहां, कहां क्या एडिट करना है, कहां क्या इमोशन आ पाया है, कुछ भी एक भावनाओं पर विशेषज्ञता पाए निर्देशक की आंखों से तो हो ही नहीं पाता है। बाद में जब वैल की आंखों की रोशनी आ जाती है और फिल्म रिलीज होती है, वह भी देखता है और कहता हैकिस अंधे ने ये फिल्म बनाई है। अमेरिका से फांसी खा लेने की हद तक नेगेटिव रिव्यू आने के बाद एक आशा की किरण आती है... संदेशवाहक और वैल का दोस्त कहता है, तुम्हारी फिल्म. फ्रेंच लोगों ने तुम्हारी फिल्म पैरिस में देखी है। वो कह रहे हैं कि ऐसी महान अमेरिकी फिल्म बरसों में नहीं आई है। तुम्हें एक सच्चा आर्टिस्ट कहकर पुकारा जा रहा है। एक ग्रेट जीनियस

वैल बने वूडी कहते हैं... थैंक गॉड फ्रेंच एग्जिस्ट
‘तेज’ बनाने के बाद और क्रिटिक्स के रिव्यू और स्टार देखने के बाद प्रियदर्शन भी कह रहे होंगे, थैंक गॉड सिंगल स्क्रीन्स एग्जिस्ट।

तो अब प्योरली आते हैं ‘तेज’ पर। कैसी है फ़िल्म? क्या है फिल्म?

जब मैं यह कहता हूं कि प्रियदर्शन सिंगल स्क्रीन वाले दर्शकों को थैंक्स कह रहे होंगे, तो उसका मतलब यह है कि फिल्म उन्हें ही पसंद आएगी। वजह ये कि जिन दर्शकों ने डायरेक्टर टॉनी स्कॉट की पिछली दो फिल्मों 'अनस्टॉपेबल और ' टेकिंग ऑफ फेलम 123’ को नहीं देखा है, वह 'तेज’ देख सकते हैं। उन्हें फिल्म की बदली विदेशी पृष्ठभूमि, रेलवे के सेंट्रल रूम के अंदर काम करने का तरीका, ट्रेन में बम, फिर फिरौती की बात, विदेशी कॉप वाले अंदाज में अनिल कपूर की भागा-दौड़ी, समीरा रेड्डी का बाइक परहेवायर वाली मैलोरी के अंदाज में स्टंट सीन करना और जायद खान के बॉडी डबल का अनोखे अंदाज में लंदन की गलियों में दीवारें फांदते-कूदते भागना नया लगेगा। जिन्होंने डेंजल वॉशिंगटन अभिनीत दोनों फिल्में देखी हैं, उन्होंने तो ये एहसास जी रखा है। तो उनके लिए इस अधपकी, तकनीकी रूप से कहीं कमजोर और भावविहीन फिल्म को देखना भला किस काम का होगा। उनके लिए वक्त और मुद्रा दोनों बेकार करने से तो बेहतर यही होगा न कि 1994 में आई निर्देशक जेन बॉन की शानदार फिल्म स्पीड की डीवीडी लगाकर देख लें। हर बार वही आनंद, वही मनोरंजन और वही किस्सागोई का नशा इस फिल्म और इस जैसी दूसरी रेल-बस एक्शन थ्रिलर वाली फिल्मों में मिल ही जाता है, टीवी प्रसारण में भी पूरा पूरा।

बात ‘तेज’ की करें तो इसकी कहानी और नाम का कोई मेल नहीं है। न जाने किस तर्क से रखा गया। क्योंकि यहां तेज कुछ भी नहीं है। कहानी ये है कि आकाश (अजय) और निकिता (कंगना) की हिंदु मैरिज एक्ट से हुई शादी को इंग्लैड का कानून मान्यता नहीं देता, इसलिए आकाश को इंडिया डिपोर्ट कर देता है। जलालत के कुछ साल बाद वह लंदन लौटता है, बदला लेने के इरादों के साथ। इसमें उसका साथ देते हैं मेघा (समीरा) और आदिल (जायद), जिनकी आकाश ने कभी बहुत मदद की थी। खैर, अब लंदन से ग्लासगो जाने वाली ट्रेन में आकाश ने दो बम फिट कर दिए हैं, अगर स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम हुई तो विस्फोट हो जाएगा। इस स्थिति से निपट रहे हैं रेलवे के हैड ट्रैफिक कंट्रोलर संजय रैना (बोमन), जिनकी बेटी (अविका गौर) भी ट्रेन पर है। वहीं रिटायर होने की अगली सुबह ही पुलिस डिपार्टमेंट अपने सुपर कॉप अर्जुन खन्ना (अनिल) को फिर ड्यूटी पर बुला लेता है।

कहानी में बेहद रुचि भरे किरदार हो सकते थे मलयाली एक्टर मोहनलाल (जो प्रियदर्शन की तकरीबन हर मलयाली फिल्म में रहे हैं), जिनका बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ। कुल जमा चार-पांच छोटे-छोटे मौकों पर वह नजर आते हैं और बेहद बारीक प्रदर्शन करते हुए। वह जोड़ते हैं, बांधते हैं, पर गुब्बारे में पहले से ही छेद होता है, और हवा की तरह फिल्म से उनका किरदार बाहर निकल जाता है। वह बम वाली ट्रेन पर होते हैं एक कैदी को ले जाते हुए और मुझे आश्चर्य हुआ कि ट्रेन के अंदर उन्हें और उनकी कोशिशों को लेकर कोई कहानी नहीं बनाई गई। जैसे किस्पीड में होता है।

काफी कम सीन में दिखी रोती-धोती कंगना एक दृश्य में अजय के किरदार को अपने पिता से मिलवाने लाई है। वह बाहर बैठा है और कंगना अंदर बात कर रही है। अपने पिता से बोलती है, पापा तमीज से बात कीजिए, आपसे तो ज्यादा पढ़ा लिखा है, इंजीनियर है यहां से हमें पता चलता है कि वह इंजीनियर है, क्योंकि इससे पहले तक फिल्म में अजय देवगन की इमेज बस प्रताड़ित, कमजोर इंसान की थी। उसके कुछ नहीं आता, कोई हीरोइक बात नहीं, बिल्कुल आम सा है, कमजोर सा तो लगता है। ये सब महसूस होने की वजह से लगा कि जब सात साल बाद भारत से ब्रिटेन लौटा है बदला लेने तो इंडिया में तो कहीं से सीखकर आया होगा न। मगर इंडिया में रहकर बदला लेने के लिए क्या रणनीति बनाई, कैसे तैयारी की, क्या किया वगैरह.. कुछ नहीं पता। मसलन, वेडनसडेमें भी नसीरुद्दीन शाह के किरदार को कोई तैयारी करते हुए नहीं दिखाया जाता, लेकिन फिल्म के आखिर में मुंबई के पुलिस कमिश्नर राठौड़ उससे पूछते हैं, बम बनाना कहां सीखा, तो किरदार कहता है,आप नेट पर जाकर बम टाइप कीजिए 239 ( जाने कितने) तरीके लिखे मिल जाएंगे, वहीं से सीखा है। तो इतने भर से हम संतुष्ट हो जाते हैं कि हां भई संभव है। अब अजय इंजीनियर हैं, तो उसमें उनकी विशेषज्ञताएं नहीं बताई गई हैं, न ही कहीं जिक्र आता है। वह एक प्राइवेट कंपनी चलाते थे उसके बारे में भी कुछ नहीं बताया गया है कि कंपनी वो कितनी स्मार्टली या मूर्खता से चला रहे थे, उस कंपनी में उनकी इंजीनियरिंग कितनी काम आ रही थी, तब उन्हें बम वगैरह का कितना पता था। या फिर एक फिरौती की तैयारी के लिए जो दिमाग चाहिए होता है वो कितना कारगर उनके पास था। अगर यह भी नहीं तो जो इंसान इमीग्रेशन नियमों को पूरा करने में मात खा जाता है वह एकाएक इतने हौसले वाला और योजना बनाने वाला कैसे हो जाता है। ये कहीं न कहीं दिखाना था, पर नहीं दिखाया गया। यही वजह है कि अजय देवगन का किरदार पूरी तरह बोरिंग और फालतू हो जाता है। रेग्युलर दर्शक उन्हें चाहते हैं इसलिए देखते जाने में कोई बुराई नहीं, पर देखकर कुछ भी एहसास नहीं होता है।

बोमन ईरानी के किरदार में कुछ-कुछ जान है। पहले अपनी बेटी को छोड़ने जाना, फिर कंट्रोल रूम में परेशान होते हुए योजना बनाना। यहां मुझे ऐसा लगा कि बोमन के पास करने के लिए क्षमताएं खूब थीं, पर प्रियदर्शन के पास दृष्टिकोण और विचार नहीं थे कि उनसे क्या करवाया जाएं। जैसेथ्री इडियट्स में राजकुमार हीराणी उनसे करवा ले जाते हैं। आईआईटी के एक प्रोफेसर के रोल में उनके दिखने का ढंग और उसपर अटल बिहारी वाजपेयी वाले अंदाज में जीभ को तालू से बार-बार लगाते हुए बोलने का अंदाज, ये सब निर्देशक के दृष्टिकोण से होता है। बोमन यहां भी कुछ वैसा कर सकते थे, पर पटकथा या निर्देशक करवाए तब तो।

अनिल कपूर सुंदर और छरहरे दिखते हैं, उनके सीन भी ठीक जाते हैं, पर कहीं कोई एंकर नहीं है, जहां किरदार का रोचक जहाज बेड़ा डाल सके। उनका अपनी वाइफ और बच्ची के साथ रिश्ता भी खोला नहीं गया है। उन्हें सीधा रिटायरमेंट के दिन में दिखाया गया है, पर पूरे कार्यकाल में वह कैसा कॉप रहा है और वह किस चीज को लेकर कुख्यात या विख्यात है यह भी नहीं बताया जाता है। जैसे फॉलिंग डाउन में भी एलएपीडी सार्जेंट प्रेंडरगास्ट (रॉबर्ट डूवाल) होता है, जो रिटायर होने वाला होता है। यह उसका आखिरी दिन होता है और सड़कों पर घूम रहे सिस्टम के खिलाफ हथियार का मुंह खोल चुके इंसान को ढूंढने का जिम्मा वह खुद उठाता है। उसका पारिवारिक चेहरा भी दिखाया जाता है। कैसे कुछ पागल सी बीवी दिन में कई बार दफ्तर में उसे फोन करती है, ये सारा जटिल रिश्ता फिल्म में खुलता है। ये भी उघड़ता है कि एक कॉप के तौर पर वह ताकरियर डेस्क के पीछे ही रहा है और उसकी पीठ पीछे दफ्तर में बातें भी होती है कि इसने आज तक न तो एक भी गिरफ्तारी की है और न ही किसी को गोली मारी है। तो ये इश्यू भी चलते हैं। यहां तक कि टेकिंग ऑफ फेलम 123’ में भी डेंजल वॉशिंगटन के किरदार वॉल्टर के एक सबवे कार कॉन्ट्रैक्ट में रिश्वत लेने का पेंच बीच में चलता रहता है। इस मामले में द बर्निंग ट्रेन आदर्श फिल्म थी। उसमें सब कुछ था। एक मजबूत कहानी थी। बहुत सारी भावनाएं, किरदारों के परिचय और उनके ऐसा होने की पर्याप्त वजहें थीं।

फिल्मों के विश्लेषण की बात आती है तो एक बड़ी छोटी और बारीक मगर महत्वपूर्ण चीज यहां भी दिखी। एक दृश्य में अनिल कपूर ने कहे मुताबिक फिरौती के रुपये एक वॉटरप्रूफ पीले केस में डालकर उसे तेज बहती नदी में डाल दिया है। थोड़ा आगे तैनात समीरा रेड्डी का किरदार अपने हवा भरी बोट में वह केस लाद लेती है और आगे बढ़ती है। तभी ऊपर पुलिस का हैलीकॉप्टर आ जाता है गोलियां बरसाते हुए। नाव पलट जाती है और लगता है वह मर गई। कुछ सेकेंड बाद वह केस और समीरा दोनों पानी की सतह पर उभरते हैं और पृष्ठभूमि में (किसी महत्वपूर्ण किरदार के जीवित बचने) राहत की सांस लेने वाला म्यूजिक बजता है, वैसा ही जैसा भले लोगों के जिंदा रहने पर होता है। सवाल यह है कि फिल्म में समीरा, अजय और जायद सही राह पर नहीं हैं, ऐसे में बतौर फिल्ममेकर आप यह फैसला कैसे कर सकते हैं कि गलत को बचाना है और इसीलिए जनता के मन में सहानुभूति विकसित करें।

तेज का मटीरियल भी निर्देशक प्रियदर्शन के लायक था और उनकी काबिलियत भी पूरे से जरा ज्यादा ही थी, मगर इस बार वह अपनी फिल्म के साथ औसत भी नहीं हो पाए हैं अच्छा होना तो दूर है।
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गजेंद्र सिंह भाटी