Wednesday, September 5, 2012

टाइगर हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर नहीं है, बस एक फिल्म है, जिसे देखनी थी देख ली, जिसे देखनी है देख लेगा

“In the dark world of intelligence and espionage, there are shadows without faces, and faces without names. Governments fight shadow battles through these soldiers of the unknown. Battles have no rules, No limits. Nobody on the outside knows what goes on in these secret organizations. All information is guarded in the name of National security. But, some stories escape the fiercely guarded classified files. Stories that become legends. This is a film about one such story, a story that is spoken about only in hushed whispers. A story that shook the very foundation of this dark world. But like all reports that come out of this uncertain world, nobody will ever confirm those events. It may or may not have happened. This story is about an agent named TIGER. It may now be told...”

गंभीर प्राक्कथन। पढ़ने के बाद हमारी भौंहे किसी रहस्य-रोमांच और बुद्धिमत्ता भरी कहानी को देखने के लिए खुद को तैयार करती हैं। उम्मीद करती हैं कि कोई ‘बोर्न आइडेंटिटी’ माफिक चतुर पटकथा रास्ते में जरूर आएगी। चूंकि ‘काबुल एक्सप्रेस’ जैसी सहज फिल्म बनाने वाले (मिसाल में ‘न्यू यॉर्क’ को न जोड़ें) कबीर खान का निर्देशन है और कहानी को इंडिया के असली जासूस गंगानगर मूल के रविंद्र कौशिक (उनका छद्म नाम ‘ब्लैक टाइगर’ था) की जिंदगी पर आधारित बताया जाता रहा, तो यहां तक दर्शक को भी सहज रहने और फिल्म देखकर कुछ नया पाने की उम्मीद करने का पूरा अधिकार रहता है। मगर जब फिल्म के जासूसी किरदार टाइगर के साथ सलमान खान का नाम जुड़ता है तभी से ये प्राक्कथन और गंभीरता की उम्मीदें खत्म करनी पड़ती हैं। यहां से स्क्रिप्ट, निर्देशक और टाइगर का किरदार गौण हो जाता है और सलमान खान व उनके तथाकथित प्रशंसक मुख्य हो जाते हैं। तो फिल्म देखने के तमाम मानदंड यहां बदलते हैं।

‘वॉन्टेड’, ‘दबंग’, ‘रेडी’ और ‘बॉडीगार्ड’ के बाद ‘एक था टाइगर’ भी बंधे-बंधाए सूत्रों और अपेक्षाओं के साथ आती है। (बंधे-बंधाए सूत्र और अपेक्षाएः- कहानी शुरू होगी। हीरो, हीरोइन, विलेन, हीरो का मिशन और बाकी कुछ चीजें स्थापित होंगी। थोड़ी देर में केंद्र में हो जाएंगी हीरो-हीरोइन की नोक-झोंक, बार-बार मिलना, गाने गाना, डायलॉगबाजी और चुहलबाजी। फिर वफादार दर्शक सलमान भाई और उनकी प्रचलित अठखेलियों के आगोश में कहकहे लगाएगा। काफी देर बाद हीरो से विलेन मिलेगा। या फिर कहानी का मुख्य बिंदु, गाड़ी चल पड़ेगी और फिल्म आगे बढ़कर खत्म हो जाएगी।) और उन पैमानों पर ‘एक था टाइगर’ अव्वल आती है। कोई शिकायत नहीं रहती। पर काली कलम लेकर काले अक्षर उकेरे जाने हमेशा जरूरी रहे हैं। तो...

‘एक था टाइगर’ की सबसे चतुर चीज वो लगती है जब क्यूबा की धरती पर गाना गाते सलमान और कटरीना से ध्यान हटाकर कैमरा एक दीवार की तरफ केंद्रित होता है। इस दीवार पर वहां की भाषा में साम्यवादी क्रांतिकारी हीरो चे गुवेरा का एक कथन लिखा होता है, जिसका अर्थ होता है, “जिस मुहब्बत में दीवानगी नहीं, वो मुहब्बत ही नहीं”। सही कहूं तो इस उक्ति के चतुर इस्तेमाल के अलावा न तो मुहब्बत कहीं नजर आती है, न दीवानगी। नजर आता है तो बेहद चतुराई से फिल्माया गया (चतुर यूं कि इसे देखते हुए ज्यादातर वक्त ये लगता है कि इन स्टंट्स में सलमान खान ने बॉडी डबल का इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि सारी विस्मयकारी उछल-कूद मोरक्को जैसी लगने वाली (उत्तरी इराक) किसी विदेशी धरती पर उन्होंने खुद की है) फिल्म का ओपनिंग एक्शन सीक्वेंस। सब्जी बाजार, छतों, खिड़कियों, सड़कों और भीड़ के बीच कारीगरी भरी एडिटिंग और छायांकन के अलावा अगर कोई इन एक्शन को ध्यान से देखेगा तो पाएगा कि सलमान की ही काठी का कोई नौजवान ये सीन कर रहा है। जहां कहीं सामने की ओर से भागते सलमान दिखते हैं, वहां कंप्यूटर ग्राफिक्स से किसी बॉडी डबल के चेहरे पर सलमान का मुखौटा लगाया होता है। जैसा बहुत बरस पहले एक कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन में सचिन और उनका मुखौटा लगाए बच्चे नजर आए थे। बहुत बारीकी से देखें तो आसानी से फर्क जान पाएंगे। जब बात स्टंट की हो रही है तो फिल्म में ट्रैन में लड़ने वाला सीक्वेंस पूरी तरह हवा-हवाई है, यानी ऐसा असंभव स्टंट जो काल्पनिक कहानी में भी संभव तरीके से नहीं फिल्माया लगता। वहीं सबसे आखिर में एक चार्टर्ड हवाई यान के समानांतर मोटरसाइकिल दौड़ाकर उछलना और यान को पकड़ना, बेहद प्रभावी दृश्य है। असंभव है, पर फिल्माने के तार्किक तरीके से संभव हो जाता है।
विदेशी मिशन पर जाने और हीरोइक करतब करने के अलावा टाइगर (सामाजिक जीवन में उसका नाम ये नहीं है) की दिल्ली की औसत कॉलोनी में रहने वाली लाइफ भी है। सुबह किसी आम आदमी की तरह ही, वह अपने दरवाजे पर पतीला पकड़े खड़ा होता है, पतीले में दूधवाला दूध गिरा रहा होता है। वहां बनियान पहने टाइगर के पहलवानी रूप और दर्शकों के सब-कॉन्शियस माइंड में पसरे सलमान खान के ऑरा का मिलन सा हो रहा होता हैं। यहां पर कुछ ग्लैमर टूटता है तो दर्शक इसे बदलाव के तौर पर लेते हैं कि देखो दिल्ली के रियलिस्टिक मोहल्ले में खड़ा है सलमान। जब फिल्म में बतौर डायरेक्टर कबीर खान और लेखक नीलेश मिश्रा जुड़े हों तो दिल्ली का वास्तविक रूप कुछ तौर पर शामिल करने की कोशिश तो दिखनी ही थी। ये और बात है कि वो वास्तविकता सही से नहीं आ पाई।

कहानी यहां से ट्रिनिटी कॉलेज पहुंचती है। रॉ प्रमुख शेनॉय (गिरीष कर्नाड) टाइगर को एक नए मिशन पर यहां भेजता है। उसे यहां ट्रिनिटी में पढ़ा रहे एक छद्म प्रफेसर (रोशन सेठ) पर नजर रखनी है। पैंट, शर्ट, कोट और टाई पहने ये जेंटलमैन कैंपस में पहुंचते हैं। इस दौरान टाइगर को पेशाब की हाजत होती है, पर वक्त नहीं मिलता, प्रफेसर निकल जाते हैं। तो झाड़ियों में मुक्त होने गया टाइगर साइकिल ले फिर प्रफेसर के पीछे भागता है। यहां हल्के में निकलने से पहले ये तथ्य भी सही से सामने आता है कि एक असल जासूस की जिंदगी कितनी मुश्किल होती है। प्रफेसर के पीछे जाने पर उनके घर की शिनाख्त बाहर से टाइगर कर लेता है। यहां उसे मिलती है जोया (कटरीना कैफ) जो प्रफेसर के घर में आ-जा सकने वाले अकेली शख्स है। रात में टाइगर जोया के हॉस्टल पहुंच जाता है।

वह खिड़की से देखती है कि टाइगर सामने बेंच पर लेटा है तो उसके कमरे में आने को बोलती है जो एक मंजिल ऊपर होता है। जोया टाइगर को पाइप पर चढ़कर आने को बोलती है तो वह उसके देखते सामने नहीं चढ़ता। लगता है, अपनी रॉ एजेंट होने की पहचान गुप्त रखना चाहता है और एकदम से पाइप पकड़कर चढ़ गया तो जोया को शक होगा कि ये राइटर तो हो नहीं सकता। पर आगे ऐसा नहीं होता। वह चढ़ जाता है। धीरे-धीरे वह जोया के मोह में यूं पड़ता है कि अपनी लेखक होने की छवि गढ़ने पर ध्यान नहीं देता और प्यार में पड़ता जाता है। दोनों के बीच एक रिश्ता बनता जाता है। एक सीन में जब टाइगर जोया को किताब उपहार में देता है तो वह रोने लगती है। वह पूछता है, कि रो क्यों रही हो तो जोया कहती है कि किसी की याद आ गई। फिल्म में यही एक खास जगह होती है, जहां सलमान के भाव बेहद प्राकृतिक लगते हैं।

ऐसे कुछेक मौकों पर वह अपनी पारंपरिक छवि से जरा अलग होते हैं, पर बीच-बीच में पुराने टोटके आते जाते हैं। मसलन, कोई टाइगर को कुछ पूछता है तो वह सोचने लगता है। उसके सोचने के भीतर एक जासूस के काम की मुश्किलों को दर्शकों के सामने मजाकिया तरीके से परोसा जाता है। कभी सोचने में उसके पीछे कुत्ते दौड़ रहे होते हैं तो कभी चाइनीज, अंग्रेज, बुर्केवाली और दूसरे किस्म की अंगरक्षक खूबसूरत लड़कियां। फिल्म में कटरीना के आमसूत्र के विज्ञापन मुताबिक रस से भरे होठ सबसे प्रॉमिनेंट रहते हैं। बंजारा... गाने में उनके होठ पर कैमरा इतनी मादकता से केंद्रित होता है कि लगता है उनमें कोई बड़ा सा इंजेक्शन घौंपा गया है। फिल्म का ये सबसे बुरा वक्त होता है।

तकनीकी तौर पर कुछ गड़बड़ियां भी रहती हैं। भारत-पाक के नुमाइंदे जब इस्तांबुल में मिलते हैं तो वहां इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लोग दौड़कर भीतर आते हैं और तुरंत सवाल पूछने लगते हैं। असल में ऐसा कहीं नहीं होता। सुरक्षा कारणों से डेलेगेट्स और प्रेस के बीच एक कोड ऑफ कंडक्ट होता है। प्रेस को एक नियत जगह पर खड़ा होना या बैठना होता है। वो वहीं से खड़े होकर अनुशासन से सवाल पूछ सकते हैं। कॉन्फ्रेंस में लाल बॉर्डर वाली काली सलवार-कमीज पहने सिर पर चुन्नी डाले कटरीना पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी सी ज्यादा लगती हैं और किसी आईएसआई एजेंट सी कम। वैसे हो भी सकता है क्योंकि सीक्रेट एजेंट तो कोई भी हो सकता है।
बाद में फिल्म क्यूबा पहुंचती है। जहां अपनी-अपनी गुप्तचर एजेंसियों को धता बता, अपने प्यार के पर फैलाए जोया-टाइगर चले आते हैं। पहले हिंदी फिल्मों में यूं क्यूबा नहीं आया गया है। संदर्भ के लिहाज से (दोनों किरदारों का दुनिया के खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट पर यूं भटकना) फिल्म यहां एंजलीना जॉली की ‘सॉल्ट’ और उनकी-जॉनी डेप की ‘द टूरिस्ट’ जैसी भी लगती है। पर खूबसूरत लोकेशन पर जाने से काम नहीं चलता। हवाना, क्यूबा जाने को एयरपोर्ट पर भेस बदलकर खड़ी कटरीना की नाक और सलमान की दाढ़ी खूब नकली लगती है, समझ नहीं आता कि उन्होंने इस रफ मेकअप को फाइनल प्रिंट में स्वीकार कैसे कर लिया। वह मेकअप लरत-लरज गिरता लगता है।

इस साल मार्च में ‘एजेंट विनोद’ आई थी। हॉलीवुड की बॉन्ड और जेसन बॉर्न फिल्मों के जवाब में। अब आई है ‘एक था टाइगर’। हालांकि इस लीग से तो ये फिल्म तुरंत बाहर हो जाती है, पर भारत के कस्बाई दर्शकों के लिए ठीक-ठाक मनोरंजन लेकर आती है। हिंदी सिनेमा में सीधे तौर पर फिल्म का कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं रहेगा। न ही प्रस्तुति और कहानी कहने के ढंग में कोई अनूठापन है। बस ये एक फिल्म है, सलमान खान की फिल्म, कटरीना कैफ की फिल्म, जिन्हें देखनी थी थियेटर में देखी, जिन्हें फिर देखनी है जल्दी ही टीवी प्रीमियर में देख पाएंगे। इससे ज्यादा बात करने को कबीर खान की ‘एक था टाइगर’ में कुछ है नहीं।
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गजेंद्र सिंह भाटी