Wednesday, December 26, 2012

निकोलस जरैकी की आर्बिट्राजः हिरना समझ-बूझ बन चरना

Richard Gere in a still from Nicholas Jarecki's 'Arbitrage.'

'लाल जूतों वाली लड़की', 'कुबड़ा', 'पानी में आग', 'दिल्ली के दरिंदे', 'नीला फूल', 'मैं उससे प्यार करता था', 'नन्हा राजू', 'सोफिया माई लव', 'घर-गृहस्थी', 'खूनी बाज़', 'परोपकारी शरमन', 'गैंग्स ऑफ लुधियाना', 'ग़रीबनवाज', 'डेंजर्स ऑफ पोएट्री', 'अल्वा ने बनाया गाजर का हलवा', 'वीर दुर्गादास राठौड़', 'चंचल चितवन', 'हो जाता है प्यार', 'मेरे सपनों की मल्लिका', 'आखिरी इम्तिहान', 'घबराना नहीं', 'इनडीसेंट वूमन', 'प्ले डे', 'ही विल किल यू' और 'बस गई अब बस करो'। फिल्म का नाम चाहे कोई भी हो, अलग छाप लगाता है। हर नाम, हर दर्शक के मानस रसायनों में अलग चित्रों को लिए घुलता है। जिसे अंग्रेजी ज्यादा न आती हो और ‘आर्बिट्राज’ देखने जाना हो तो वह इस शब्द के पहले अक्षर में आती ‘अ’ की ध्वनि में कुछ सकारात्मक महसूस करेगा या फिल्म कैसी होगी इसको लेकर न्यूट्रल उम्मीदें रखेगा। जो जरा ज्यादा जानता हो और कभी आर्बिट्ररी अदालतों के बारे में सुना हो तो कुछ पंच-पंचायती या बीच-बचाव का अंदाजा लगाएगा। फिर वो जो जानते हैं कि आर्बिट्राज का मतलब उस किस्म के बड़े कारोबारी मुनाफे से होता है जो एक जैसी परिसंपत्तियों या लेन-देन के बीच छोटे अंतर से उठाया गया होता है, हालांकि ये तरीका नैतिक नहीं होता। हम जब फिल्म देखते हैं तो इसके मुख्य किरदार रॉबर्ट मिलर (रिचर्ड गेयर) को जिंदगी के हर मोर्चे पर, चाहे वो कारोबार हो या रिश्ते, ऐसे ही आर्बिट्राज करते पाते हैं। उसकी आदर्श और सफल अमेरिकन बिजनेसमैन होने की विराट छवि के पीछे खोई हुई नैतिकता है, कारोबारी घपले हैं और रिश्तों में आई दरारें हैं। मगर निर्देशक निकोलस जरैकी अपनी इस कहानी में उसे आर्बिट्राज करने देते हैं। उसे इन गलत मुनाफों को कमाने देते हैं। उसे जीतने देते हैं। पर हर सौदा एक टूटन छोड़ जाता है। रॉबर्ट इंडिया और सकल विश्व में बनने वाली बिलियनेयर्स की सूची के हरेक नाम की कम-ज्यादा कहानी है। वो सभी जो आदर्श कारोबारी की छवि ओढ़े हैं, समाज में अपनी रसूख की कमान पूरे गर्व के साथ खींचे हैं और जिनकी कालिख कभी लोगों के सामने नहीं आ पाती, वो रॉबर्ट हैं। 2008 में वॉल स्ट्रीट भरभराकर ऐसे ही लोगों की वजह से गिरी, भारत में हाल ही में उभरे घोटालों में ऐसे ही कारोबारी हाथ शामिल रहे। सब कानून की पकड़ से दूर आर्बिट्राज कर रहे हैं।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में धृतराष्ट्र को अधर्म (दुर्योधन) का साथ छोड़ने का उपदेश देते हुए महात्मा विदुर कहते हैं, “हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम्। सुह्रदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः”।। जिसका अर्थ होता है कि ‘महाराज, दूसरे का धन छीनना, परस्त्री से संबंध रखना और सच्चे मित्र को त्याग देना, ये तीनों ही भयंकर दोष हैं जो विनाशकारी हैं’। पर रॉबर्ट की बिजनेस वाली दुनिया में जो विनाशकारी है वही रिस्क टेकिंग है। जो भयंकर दोष है वही आर्बिट्राज है। और उसे ऐसे तमाम सौदे पूरे करने हैं। उसकी कहानी कुछ यूं है। वह न्यू यॉर्क का धनी हैज फंड कारोबारी है। समाज में उसकी इज्जत है, आइकॉनिक छवि है। घर पर भरा-पूरा परिवार है जो उसे बेहद प्यार करता है, उसके 60वें जन्मदिन की तैयारी करके बैठा है। वह घर लौटता है और नातियों को प्यार करता है। अपनी सुंदर योग्य बेटी (ब्रिट मारलिंग) और जमाई को थैंक यू कहता है। पत्नी एलन (सूजन सैरेंडन) को किस करता है। सब खाने की मेज पर बैठते हैं और हंसी-खुशी वाली बातें होती हैं। एक आम दर्शक या नागरिक अपने यहां के बिजनेसमैन को इतना ही जानता है। ये कहानी इसके बाद जिस रॉबर्ट से हमें मिलाती है वो अनदेखा है। रात को वह पत्नी को बेड पर सोता छोड़ तैयार हो निकल जाता है। वह जाता है जूली (लीएतितिया कास्टा) के पास। ये खूबसूरत जवान फ्रेंच आर्टिस्ट शादी के बाहर उस जैसे कारोबारियों और धनिकों की आवश्यकता है। घर पर बेटी-बीवी को तमाम अच्छे शब्दों और उपहारों से खुश करता है तो यहां जूली के न बिकने वाले आर्टवर्क को ऊंचे दामों पर लगातार खरीदता रहता है, ताकि उसे सहेज सके। यहां इनका प्रणय होता है। रॉबर्ट किसी देश में बहुत सारा रूपया लगा चुका है। मगर अब उस मुल्क में हालात कुछ और हैं और उसका पैसा डूब चुका है। वह इन 400 मिलियन डॉलर की भरपाई कंपनी के खातों में हेर-फेर करके करता है। इससे पहले कि निवेशक, उसकी बेटी या खरीदार कंपनी पर बकाया इस रकम के बारे में जाने वह अपने वेंचर कैपिटल कारोबार का विलय एक बड़े बैंक के साथ कर देना चाहता है। पर अंतिम आंकड़ों को लेकर बातचीत बार-बार पटरी से उतर रही है। यहां तक रॉबर्ट के पास करने को पर्याप्त कलाबाजियां हैं, पर भूचाल आना बाकी है। अब कुछ ऐसा होता है कि एक अपराध उससे अनजाने में हो जाता है और न्यू यॉर्क पुलिस का एक ईमानदार डिटेक्टिव माइकल ब्रायर (टिम रॉथ) उसके पीछे पड़ जाता है।

जरैकी अपने इस किरदार को जीतने देते हैं लेकिन बताते हैं कि ये जीत रिश्तों में बड़ी टूटन छोड़ जाती है। एक-एक रिश्ते में। पत्नी एलन वैसे तो पहले भी एक रईस कारोबारी की बीवी होने के साथ आई शर्तों से वाकिफ होती है और चुप होती है, पर जब बात आर-पार की आती है तो वह रॉबर्ट से अपनी बेटी के लिए पद और पर्याप्त पैसे मांगती है। वह मना कर देता है तो एलन कहती है, “पुलिस मुझसे बात करने की कोशिश कर रही है और मैं तुम्हारे लिए झूठ नहीं बोलने वाली”। कुछ रुककर वह फिर कहती है, “आखिर तुम्हें कितने रुपये चाहिए? क्या तुम कब्र में भी सबसे रईस आदमी होना चाहते हो?” ब्रूक पिता के कारोबार की सीएफओ है। अब तक वह खुद को पिता का उत्तराधिकारी समझती है पर जब खातों में हेर-फेर का पता चलता है और ये भी कि ये पिता ने ही किए हैं तो वह भाव विह्अल हो जाती है। रॉबर्ट उसे वजह बताता है पर वह सहज नहीं हो पाती। गुस्से में कहती है कि “आपने ये किया कैसे, आपके साथ मुझे भी जेल हो सकती है”। रॉबर्ट कहता है, “नहीं तुम्हें कुछ नहीं होगा”। वह कहती है, “मैं इस कंपनी में आपकी हिस्सेदार हूं, मैं भी दोषी पाई जाऊंगी”। तो वह कहता है, “नहीं, तुम मेरे साथ काम नहीं करती हो तुम मेरे नीचे काम करती हो”। बेटी का आत्मविश्वास और भ्रम यहां चूर-चूर हो जाता है। हालांकि रॉबर्ट एक पिता के तौर पर उसे बचाने के उद्देश्य से भी ये कहता है कि तुम मेरे साथ नहीं मेरे अंडर काम करती हो, पर ब्रूक को ठेस लगती है। फिल्म में आखिरी सीन में जब एक डिनर पार्टी में बड़ी घोषणा की जाती है और अपने पिता के बारे में ब्रूक भाषण पढ़ती है और उन्हें सम्मानित करते हुए स्टेज पर बुलाती है तो दोनों औपचारिक किस करते हैं और वहां ब्रूक के चेहरे पर नब्ज की तरह उभरता तनाव इन सभी घरेलू रिश्तों के अंत की तस्वीर होता है। रॉबर्ट रिश्ते हार जाता है।

फिल्म के प्रभावी किरदारों में टिम रॉथ हैं जो पहले ‘रिजरवॉयर डॉग्स’, ‘पल्प फिक्शन’ और ‘द इनक्रेडेबल हल्क’ में नजर आ चुके हैं। एक पिद्दी सी सैलरी पाने वाले डिटेक्टिव होते हुए वह अरबपति रॉबर्ट मिलर का पेशाब रोक देते हैं। जब ब्रायर बने वह रॉबर्ट के पास तफ्तीश के लिए जाते हैं तो पूछते हैं, “ये आपके माथे पर क्या हुआ”। रॉबर्ट कहता है, “कुछ नहीं, दवाइयों वाली अलमारी से टकरा गया”। तो उस अनजानेपन से वह जवाब देता है, जिसमें दोनों ही जानते हैं कि सच दोनों को पता है कि “हां, मेरे साथ भी जब ऐसे होता है तो बड़ा बुरा लगता है”। कहानी में इस अदने से जांच अधिकारी का न झुकना और सच को सामने लाने में जुटे रहना अच्छी बात है। ये और बात है कि रॉबर्ट उसे सफल नहीं होने देता। केस में एक जगह वह टिम और पुलिस विभाग को अदालती फटकार दिलवा देता है तो दर्शक खुश होते हैं जबकि असल अपराधी रॉबर्ट होता है। फिल्म में अच्छे-बुरे की पहचान और दर्शकों की सहानुभूति का गलत को चुनना परेशान करने वाला चलन रहा है और रहेगा।

जैसा कि हम बात कर चुके हैं रॉबर्ट आदर्श अमेरिकी कारोबारी की छवि रखता है। सेल्फ मेड है। हो सकता है अमेरिकी संदर्भों में उसके आर्बिट्राज सही भी हों। पर रिचर्ड गेयर अपने इस किरदार की पर्सनैलिटी की तहों में काफी ब्यौरा छोड़ जाते हैं। सेल्समेन और सेल्सगर्ल्स के इस युग में सभी को आर्थिक सफलता के लिए डेल कार्नेगी या उन जैसों की लिखी सैंकड़ों रेडीमेड व्यक्तित्व निर्माण की किताबें मुहैया हैं, जिनमें सबको चेहरे पर खुश करना सिखाया जाता है। “सर आपने आज क्या शर्ट पहनी है”... “कल तो जो आपने कहा न, कमाल था”... “आपने जो अपने आर्टिकल में लिखा वो मुझे... उसकी याद दिलाता है”। रॉबर्ट मिलर भी इन्हीं सूत्रों से सफल बना है। वो सूत्र जो ऊपर-ऊपर बिन्नैस और रिश्तों को सुपरहिट तरीके से कामयाब रखना सिखाते हैं, पर उतनी ही गहराई में जड़ें खोखली करते हैं। क्योंकि पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट वाले इसका जवाब नहीं देते कि आखिर जब रॉबर्ट ने भी ये नियम सीखे थे तो क्यों बुरे वक्त में फैमिली ने उसका साथ न दिया? क्यों उसने रिश्तों में वफा नहीं बरती? क्यों उसमें सच को कहने की हिम्मत नहीं बची?

खैर, अगर अब उसके उद्योगपति लोक-व्यवहार को देखें तो वह जरा कम सहनशील हो चुका है। जैसे अपनी आलीशान महंगी कार में बैठकर वह फोन पर अपने अर्दली से कहता है, “बस पता लगाओ कि मेफिल ने हमें अभी तक फोन क्यों नहीं किया है?” तो वह जवाब देता है, “लेकिन मैं कैसे पता लगाऊं”। इस पर रॉबर्ट जरा भड़ककर कहता है, “अरे यार, क्या हर चीज मुझे खुद ही करनी पड़ेगी क्या, बस पता लगाओ। ...लगाओ यार, ...प्लीज। थैंक यू”। ये फटकार वाली लाइन आखिर में जो ‘प्लीज’ और ‘थैंक यू’ शब्द लिए होती है, ये चाशनी का काम करते हैं और लोक-व्यवहार की कला को कायम रखते हैं। जब बैंक के प्रतिनिधि से बात करने एक नियत जगह पर पहुंचता है तो मुश्किल हालातों में नहीं हो पा रहे विलय का गुस्सा उतारते हुए कहता है, “मैं ग्रेसी चौक का शहंशाह हूं (आई एम द ऑरेकल ऑफ ग्रेसी स्क्वेयर), मैं तुम्हारे पास नहीं गया था तुम मेरे पास आए थे...” पर जब सामने वाला कहता है, “रॉबर्ट मुझे लगता है हम बेकार बात कर रहे हैं (उसकी अरुचि दिखने लगती है, हो सकता है वह उठकर ही चला जाए)” तो तुरंत अपना रुख बदलते हुए रॉबर्ट कहता है, “अच्छा छोड़ो, छोड़ो, डील को भी भूल जाओ...”। यूं कहकर वह बात बदल देता है और बाद में उसी बिंदु पर घूमकर ज्यादा बेहतरी से आता है।

निकोलस जरैकी की ये पहली फीचर फिल्म है, इससे पहले वह टीवी सिरीज और डॉक्युमेंट्री फिल्मों व फीचर फिल्मों के तकनीकी पक्ष से जुड़े रहे हैं। वह मशहूर जरैकी परिवार से हैं। उनके माता-पिता दोनों न्यू यॉर्क में ही कमोडिटी ट्रेडर रहे हैं। आर्थिक जगत की कहानी का विचार उन्हें इसी पृष्ठभूमि से आया। उनके तीन भाई हैं। एक एंड्रयू जो फिल्म पोर्टल और वेबसाइट ‘मूवीफोन’ के सह-संस्थापक रहे हैं और जिन्होंने 2003 की मशहूर डॉक्युमेंट्री ‘कैप्चरिंग द फ्रीडमैन्स’ बनाई थी। दूसरे हैं थॉमस जो वित्त अधिकारी हैं। तीसरे हैं यूजीन जो खासतौर पर अपनी डॉक्युमेंट्री फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने ‘वाइ वी फाइट’, ‘फीक्रोनॉमिक्स’ और ‘द हाउस वी लिव इन’ जैसी कई चर्चित डॉक्युमेंट्री बनाई हैं।

प्रतिभाशाली निकोलस ने अपने बूते बिना बड़े हॉलीवुड स्टूडियो के सहयोग के आर्बिट्राज बनाई है। रिचर्ड गेयर और सूजन सैरेंडन समेत सभी अदाकारों के पास ये स्क्रिप्ट लेकर जाना उनके लिए किसी सपने से कम न था। वह गए, सबने स्क्रिप्ट पर भरोसा किया, उन्हें परखा और हां की। किसी भी लिहाज से अमेरिका की बाकी मुख्यधारा की फिल्मों से कम न नजर आने वाली ये फिल्म पूरी तरह चुस्त है और सबसे प्रभावी है इसकी निर्देशकीय प्रस्तुति। सभी वॉल स्ट्रीट फिल्मों के स्टीरियोटाइप्स से परे ये फिल्म देखने और समझने में जितनी आसान है, थ्रिल के पैमाने पर उतनी ही इक्कीस। अगर किसी युवा को महत्वाकांक्षी फिल्म बनानी हो और बजट का भय हो तो उसे आर्बिट्राज देखनी चाहिए जो उसे हौसला देगी और सिखाएगी कि कहानी और स्क्रिप्ट है तो सब कर लोगे। अमेरिकी फिल्मों के आने वाले चमकते चेहरों में निकोलस का नाम पक्का है। वह कसावट और अभिनव रंगों से भरी फिल्में बनाएंगे क्योंकि उनकी फिल्मी व्याकरण का आधार बहुत मजबूत है। बस जितने धाकड़ विषय, उतनी उम्दा फिल्में।
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गजेंद्र सिंह भाटी