Friday, January 25, 2013

पेश-ए-नज़र है, पंजाबी सिनेमा से ‘साड्डी लव स्टोरी’...

अगर मैं बच्चा होता तो धीरज रतन की बनाई ये पंजाबी फिल्म मेरे बचपन की मनोरंजक फिल्मों में से एक बनती, इसके गानों पर मैं उछलता-कूदता, अमरिंदर और दिलजीत मेरे पंसदीदा फिल्म स्टार हो जाते, सुरवीन और नीतू की खूबसूरती मेरे सपनों की फैंटेसी बनती। मगर अफसोस, मैं बच्चा नहीं हूं।


इससे पहले धीरज रतन ने ‘धरती’, ‘मेल करादे रब्बा’, ‘जिने मेरा दिल लुटेया’, 'तौर मितरां दी' और ‘जट एंड जूलियट’ जैसी हालिया पंजाबी फिल्मों (इन्हें इस वक्त की प्रमुख फिल्मों में गिन सकते हैं) की कहानी, पटकथा और संवाद लिखे हैं। निर्देशक के तौर पर ‘साड्डी लव स्टोरी’ उनकी पहली फीचर फिल्म है, जो उन्होंने लिखी भी है। कहानी एक लव स्टोरी और उसके अलग-अलग संस्करणों की है। गुरलीन (नीतू सिंह) एक एक्सीडेंट के बाद कोमा में चली गई है। अब दो युवक (अमरिंदर गिल और दिलजीत दोसांझ) उसके घर पहुंचते हैं और कहते हैं, उनका नाम राजवीर है और गुरलीन उनसे प्यार करती थी। घरवालों (सुरवीन चावला, कुलभूषण खरबंदा, डॉली आहलूवालिया, नवनीत निशां, मुकेश वोहरा) में उलझन है, क्योंकि गुरलीन ही बता सकती है कि असली राजवीर कौन है। घरवाले दोनों से उनकी लव स्टोरी पूछते हैं और अंत में जब गुरलीन को होश आता है तो भेद खुलता है। कहानी के स्तर पर यहां कुछ भी अनोखा नहीं है, प्रस्तुति और संपादन के स्तर पर कुछ नया करने की कोशिश की गई है, मगर बहुत उत्साहकारी फिल्म नहीं है। मौलिकता के लिहाज से महत्वाकांक्षी होकर कहूं तो जरा भी नहीं। दो-तीन बातें हैं जो फिल्म को आकर्षक बनाती हैं।
Seen in the still from Saadi Love Story, Amrinder Gill, Surveen Chawla and Diljit Dosanjh.
पहला, संगीत। इसमें जयदेव कुमार (दिल लै गई कुड़ी...) ने दिया है। ये सिर्फ इस फिल्म की ही बात नहीं है, तकरीबन हर पंजाबी फिल्म में अभी मजबूत म्यूजिक आ रहा है। मजबूत माने, जो कहीं से बासी न लगे, बांधे रखे और न चाहते हुए भी थिरका दे। जितनी मेहनत या प्रतिभा पंजाबी सिनेमा में संगीत के स्तर पर है अभी, यहां फिल्ममेकिंग के स्तर पर नहीं है, पर वहां पहुंच रहे हैं। दूसरा, अभिनय। दिलजीत दोसांझ ने कहीं से अभिनय सीखा है ये ज्ञात नहीं है, वह मूलत: गायक हैं (देखें, नानकी दा वीर, ट्रक, 15 सालां तों, रेडियो, पंगा, खड़कू ) और यहां यही चीज फायदेमंद है। वह प्राकृतिक होकर जो भी लाइन हो, बोलते हैं। इससे अभिनय न कम रहता है न ज्यादा जाता है। उनके कंठों में स्वर फेंकने की चपलता है। पंजाबी बोली हो और ऐसे डायलॉग तुरत फेंके जाएं और सीधे इमोशंस रखें तो हास्य पैदा हो जाता है। यही दिलजीत और अमरिंदर (साफ सुथरी छवि वाले लोकप्रिय गायक, देखें चन दा टुकड़ा या यारियां) करते हैं। हालांकि दोनों ही पेशेवर अदाकार नहीं हैं। पेशेवर तो जिमी शेरगिल को छोड़कर फिलहाल पंजाबी सिनेमा में कोई मुख्य अदाकार नहीं है। सब गायकी से ही आए हैं। सुरवीन चावला या नीरू बाजवा जैसी अभिनेत्रियां जरूर अपने अभिनय में बहुविधता ला सकती हैं। कूलभूषण खरबंदा और डॉली आहलूवालिया (विकी डोनर) जैसे चरित्र किरदारों की मजबूती तो फिल्म की नींव में लगी ही होती है। मगर हीरो लोगों के लिहाज से यहां पर धीरज जैसे निर्देशकों का काम बढ़ता है, क्योंकि फिर उन्हें सिंगर से एक्टर बने हीरो के लिए बेहद प्राकृतिक किरदार लिखने पड़ते हैं। ‘साड्डी लव स्टोरी’ में देखें, तो एक भी गहन भाव वाला दृश्य दोनों हीरो के लिए नहीं लिखा गया है। बस सीधे-सीधे दृश्य हैं, जिनमें माहौल, डायलॉग और निर्देशकीय प्रस्तुति से काम चल जाता है, बस हीरो को फ्रेम में खड़े होकर भीतर से निकलते प्राथमिक भावों में अपनी पंक्तियां बोल देनी होती हैं। फिल्म में एक भी अभिनय भरी चुनौती वाला दृश्य नहीं है जो दोनों हीरो के हिस्से आया हो। उस मामले में सुरवीन, खरबंदा और डॉली संतुलन बिठाते हैं।

जो तीसरी और आखिरी बात मुझे सबसे राहत भरी लगी वो थी हॉकियों से पीछा छूटना। जब 2010 में धीरज की ही लिखी ‘मेल करादे रब्बा’ आई थी तो उसमें जिमी शेरगिल के हीरो वाले टशन हॉकी लेकर दूसरे कॉलेज के लड़कों/गुंडों को पीटते रहने के आधार पर ही खड़े किए गए थे। पूरी फिल्म में कहीं भी हॉकी के उस हिंसक प्रयोग को गलत नहीं बताया गया, बल्कि फिल्मी मनोरंजन वाली शर्त तले न्यायोचित ठहराया जाता रहा। आखिर में लगा कि फिल्म खत्म हो रही है, अब तो कुछ सेंस डाला जाएगा, पर वहां आते हैं दिलजीत दोसांझ, अतिथि भूमिका में, हाथ में हॉकी थामे। उनके प्रवेश पर गुमराह बैकग्राउंड गीत ‘देख लो पंजाबी मुंडे किद्दा रौला पौंदे...बोतलां दे...’ बजता चलता है। वह जिमी (साथ में नीरू बैठी होती हैं) के किरदार से कहते हैं, "मेरा पढ़-लिखकर कुछ हुआ नहीं इसलिए तेरी तरह मैंने भी हॉकी हाथ में ले ली"। यहां बहुत से युवा दर्शकों को एक खास तरह का संदेश जाता है। कहने को कहा भी जा सकता है कि दिलजीत हॉकी प्लेयर बनने के संदर्भ में बात कर रहे हैं, पर पूरी फिल्म में जिमी के किरदार ने हॉकी का जैसा इस्तेमाल किया है उसके उलट कोई दूजा संदर्भ आ भी कहां से सकता है। खैर, हम बात ये कर रहे थे कि ‘साड्डी लव स्टोरी’ में कम से कम पंजाबी सिनेमा के बहुतेरे अपराध-उत्प्रेरक स्टीरियोटाइप नहीं हैं। इसलिए इतनी मनोरंजन न लगने के बावजूद मैं इसे अच्छी फिल्म कहूंगा। फिल्म कई मामलों पर कमजोर है पर अंत में भी एक भलाई वाला संदेश दिया जाता है।

देखते हुए फिल्म को मैं यूं अनुभव करता गया।

क्रेडिट्स के साथ ये गाना शुरू होता है...
नैणा ने छेड़ी ए खाबां दी गिटार,
बदलां दे रोड़ उत्तों जाणा अंबर पार...
गूंजेगी जहान विच
सारे असमान विच
दिल दे माइक उत्ते, धड़कन दी ही रफ्तार
ऐ ही ए साड्डी लव स्टोरी मेरे यार...

स्पष्ट, सुंदर, संप्रेषक। अच्छा लिखा गया। विजुअल भी साथ चलते हैं। सबसे पहले प्रीति बनी सुरवीन चावला नजर आती हैं। एक स्टेप में वह हाथ ऊपर करती हैं, तो उनकी बगल में उगे बाल नजर आते हैं। लगता है संपादक मनीष मोरे (तेरे नाल लव हो गया, मिट्टी वाजां मारदी, दिल अपना पंजाबी, मेल करादे रब्बा, तेरा मेरा की रिश्ता, धरती, जिने मेरा दिल लुटेया, जट एंड जूलियट) ने ध्यान क्यों नहीं रखा होगा, बड़ी स्क्रीन पर संपादन करते हुए भी। अब मेरे अवचेतन में संदर्भों की दूसरी परत चल रही होती है। उसमें रोजमर्रा के वायुमंडल में हावी होता फैशन, धन, फॉर्म्युला और वैचारिक मंदबुद्धि है। मुझे यूं देखने की जरूरत ‘सेटनटैंगो’ और ‘द टुरिन हॉर्स’ में बेला टार के काले, कीचड़ में भरे, गीले, धंसते, नैराश्य में तर, जड़, बंजर, काल-कवलित होते और चनखनाती गर्म हवाओं के सामने भुनते लोकों और वहां कपड़े गीले कर-कर के अपनी जांघें और बगलें पोंछती महिलाओं के लिए नहीं पड़ी। अगर ‘साड्डी लव स्टोरी’ की दूसरी अभिनेत्री नीतू सिंह पर ही आएं तो नैतिक-पुलिस वाला दंभ लिए वो ऊंचे दर्शक उसे ‘गिद्दे च लालटेण नचदी’ गाने में लाल भैंस कहते हैं। यहां सोसायटियों में शरीर के पसीने की गंध डियो से ढकने के बाद और देह के बाल बिल्कुल साफ करने पर ही असभ्य सभ्य हो पाता है। कितना अचरज भरा है कि इसी भौतिक सोच वाली आधुनिक प्रजाति के ठीक सामने बड़ा वर्ग उन मूल पंजाबियों का है जो गुरु ग्रंथ साहिब की दी हुई मौलिकता लिए हुए हैं, केश सहित, मेहनतकश शरीर से निकलने वाली पसीने की गंध सहित और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के भान सहित। मगर बड़ी तेजी से पहली तरह के पंजाबी बढ़ रहे हैं, दूसरी तरह के बीतती पीढ़ी हो रहे हैं। एटिकेट्स एक धोखे की तरह हैं, जो हमें ब्रिटिश रॉयल्टी से ताल्लुक रखने वाले किन्हीं हिज हाइनेस या हर हाइनेस के शेव किए पपी बनाते हैं। मगर बड़ी तेजी से हम बनना चाहते हैं और बन रहे हैं। सुरवीन चावला की बगल के वो एक-दो दिन पुराने बाल मुझे एहसास दिलाते हैं कि वो दो सेकेंड का दृश्य देख कितनों ने आंखें मीच ली होंगी, जैसे चाचा के कच्छे जैसे शब्दों पर ओ गॉड कहते हुए कॉमेडी सर्कस में अर्चना पूरण सिंह मीच लेती हैं। ये जो ऐसे मौकों पर भीतर का महानगरी या आधुनिक-विकसित-मेट्रोसेक्सुअल प्राणी जाग जाता है न, अपने तय ब्रैंड और प्रॉडक्ट लिए, ये कुछ दशकों या सदियों में फिर से जंगलों में जाएगा, देह पर बाल उगाएगा, मगर उससे पहले अपनी खतरनाक प्रवृति से बड़ा नुकसान करवाएगा।

अवचेतन में जब ये हरा और थका देने वाला रैप खत्म होता है तो क्रेडिट्स पर फिर ध्यान जाता है। इस वक्त लिप सिंक गड़बड़ा रहा होता है। बज रहे गाने और हिल रहे होठों में अंतर आ रहा होता है। एक जगह तो ये भी होता है कि नीतू सिंह नाचते हुए गा रही होती हैं और मर्द आवाज में गाना सुनाई दे रहा होता है। अमरिंदर के पीछे विदेशी लड़कियां नाच रही होती हैं। ये विदेशी बैकग्राउंड डांसर्स वाला जो सूत्र है पंजाबी वीडियो और फिल्मों में, बड़ा खौफनाक सा है। इतना सम्मोहन शायद ही गोरी चमड़ी के लिए विश्व के किसी और मुल्क में होगा, जितना हमारे यहां है। अब अमरिंदर को फैशन फोटोग्राफर स्थापित करना है तो पांच-छह विदेशी लड़कियों को खड़ा कर दिया जाता है। वे हिल रही होती हैं, और वह गा रहा होता है ‘ऐ ही है साड्डी लव स्टोरी मेरे यार’। दावे से कह सकता हूं कि देसी कुड़ियां भी होतीं तो उसका फोटोग्राफर होना स्थापित हो जाता। दिलजीत रॉकस्टार की तरह नीचे माथा झटक-झटक कर निभा रहे होते हैं। खैर, ये खत्म होता है, फिल्म शुरू होती है।

बराड़ साहब (कुलभूषण) घर के मुखिया हैं। बाकी सदस्य हैं मिसेज बराड़ (डॉली), उनकी बेटी (नवनीत निशां), नातिन प्रीति (सुरवीन) और पोती गुरलीन (नीतू)। गुरलीन पंजाब यूनिवर्सिटी (चंडीगढ़) के एक कॉलेज में पढ़ रही है। घरवाले विक्रम (अतिथि भूमिका) से उसका रिश्ता तय कर देते हैं। ये बताने के लिए उसके कॉलेज पहुंचते हैं तो वह कहती है कि वह राजवीर से प्यार करती है और उससे शादी करेगी। वह राजवीर के साथ मिलकर बिजनेस करना चाहती है और उसके लिए 40-50 लाख रुपये मांगती है। बराड़ साहब मना कर देते हैं (गुरलीन के पिता और बराड़ के बेटे ने बिजनेस में घाटा खाने की वजह से आत्महत्या कर ली थी)। इस पर प्रीति (सुरवीन) अपने नाना को मनाती है कि “दीदी अगर करना चाहती है बिजनेस जीजाजी के साथ तो प्लीज उन्हें पैसे दे दो न”। एक बहन के लिए दूसरी का घरवालों को मनाना यहां मुझे भोजपुरी फिल्म ‘तोहार नइके कवनो जोड़, तू बेजोड़ बाड़ू हो’ की याद दिला देता है। उसमें एक बहन अपनी मर्जी के लड़के से लव मैरिज करना चाहती है पर पिता मना कर देते हैं तो ममेरी बहन घरवालों को मनाती है। खैर, बराड़ साहब प्रीति के समझाने पर मान जाते हैं। फोन पर वह ये खबर गुरलीन को देती है तो बेहद खुश गुरलीन घर लौटती है, रास्ते में उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है। सब अस्पताल पहुंचते हैं। डॉक्टर कहता है कि वह कोमा में चली गई है। घरवाले मायूस घर आते हैं। फिर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘जागीरदार’ लिखी जीप में राजवीर (अमरिंदर) आता है। कहता है कि वह गुरलीन का राजवीर है। सब उसकी कहानी सुनते हैं, वह सुनाता है। फिर उसे घर में ठहराया जाता है। घरवाले गार्डन में आकर बैठते हैं कि एक बुलेट उसी जीप के पास आकर रुकती है। कंधे पर बड़ा सा गिटार (क्लीशे) लिए दूसरा राजवीर (दिलजीत) आता है। वह भी कहानी सुनाता है। इसे भी ठहराया जाता है। अब घरवाले दुविधा में हैं और दोनों में झूठा कौन है समझ नहीं पा रहे। इंतजार है गुरलीन के जागने का। तो कहानी आगे चलती है, सुनाने की सीमा यहीं तक की है।

दिमागी तहों में कुछ और चीजें कहानी के दौरान चलती हैं:
  • राजवीर बने दिलजीत के कमरे की दीवारों पर गुरदास मान और कुलदीप माणक की तस्वीरें लगी होती हैं। ये दोनों ही पंजाबी गायक असल में भी दिलजीत दोसांझ के आदर्श हैं।
  • क्या ‘लालटेण’ जैसे गाने के निर्माण का आधार ‘फेवीकॉल’ और ‘झंडू बाम’ जैसे हिंदी गाने हैं?
  • राजवीर एक क्लब में गिटार बजाता है और गाता है। लालटेण गाने में जब वह नाच रहा होता है तो पीछे स्क्रीन पर ‘वीएच1’ चैनल चल रहा होता है। क्षेत्रीय म्यूजिक चैनल तो हालांकि ‘पीटीसी’ और ‘एमएच1’ हैं, पर अंतरराष्ट्रीय ‘वीएच1’ का चलना म्यूजिक कल्चर और तय हो चुकी दिशा को दिखाता है।
  • पैट्रोल पंप पर राजवीर और गुरलीन में उलझन हो जाती है कि 100 रुपये तेल के किसने चुका दिए हैं? झगड़े के बाद दोनों 50-50 का तेल भरवा लेते हैं। अगली सुबह राजवीर (दिलजीत) को पता चलता है कि वह रुपये तो उस लड़की के थे। वह अपनी बुलेट ले निकलता है गुरद्वारे चढ़ाने। वहां बाहर आइसक्रीम की गाड़ी पर बहुत से बच्चे दिखते हैं तो उन्हें आइसक्रीम खिलाने के लिए वो रुपये दे देता है। मगर मुड़ता है तो गुरद्वारे से निकल रही गुरलीन दिखती है। वह बच्चों से रुपये ले उसके पीछे जाता है। बाद में होता ये है कि पचास रुपये देने के बाद दोनों एक रेस्टोरेंट में जाते हैं वहां शेक और जूस ऑर्डर करते हैं। बिल बनता है लगभग 300 रुपये का। क्या ये फिल्मों का पुराना क्लीशे नहीं है कि 50 रुपये के पीछे 300 रुपये खर्च हो जाते हैं? न जाने क्यों, अजीब लगता है।
  • घर की बच्ची (गुरलीन) कोमा में है, अस्पताल में पड़ी है, लेकिन घर में उस किस्म की टेंशन नहीं है। सुरवीन सपनों में खोई दीवानी सी अपने कथित जीजाजियों से उनकी और दीदी की लव स्टोरी सुनाने की रिक्वेस्ट करती रहती हैं। दादी और सासू भी अपने-अपने फ्यूचर जमाइयों को खिलाने, पिलाने, दुलारने में लगी रहती हैं। कहीं कोई दुखी नहीं है। बस एक कुलभूषण खरबंदा के चेहरे पर गुस्सा या चिंता रहती है, जो उनका चारित्रिक गुण ज्यादा लगता है और गुरलीन की तबीयत की चिंता कम।
  • और तो और प्रीति के बर्थडे पर बड़ी आलीशान पार्टी मनाई जाती है, खूब नाच-गाना होता है। ‘टेंशन नी लेणी सोणिए...’ संभवत: फिल्म के सबसे कमजोर क्षणों में से एक है।
  • ‘कोठी वी पवा दूं, तेनू सोने विच मड़वा दूं...’ ये लब भारत की क्षेत्रीय पारंपरिकता से आते हैं। जैसे, राजस्थान में ‘बींटी’ (अंगूठी) और ‘कांगसियो’ (कंघा) जैसे लोकप्रिय गाने हैं, जो हार्मोनियम और ढोलक लेकर ढोली गाते रहे। आज भी गाए जाते हैं। इनमें नायिका या तो इन चीजों को बनवाने या दिलवाने की मांग पूरे गाने में रोमैंटिक तरीके से पिया से करती है या फिर सैंया खुद उसे मनाते हुए, रिझाते हुए इन चीजों को ला देने की बात हीरोइन से कह रहे होते हैं।
  • कहानी की प्रस्तुति थोड़ी दुहराव भरी है। पहले लव स्टोरी 1 होती है, फिर लव स्टोरी 2, फिर रीकैप 1, फिर रीकैप 2, फिर इंटरवल के बाद इंटरवल से पहले का रीकैप और उसके बाद दोनों कहानियां गलत साबित होने पर दोनों लव स्टोरी पर क्रॉस मार्किंग। ... चूंकि चीजें लौट-लौटकर आती हैं इसलिए ये प्रारूप नयेपन को खत्म करता है। ऐसा भी लगता है कि विषय-वस्तु कम थी और कहानी में चिपकाव कम था जिसे बढ़ाने के लिए इस भटकाव को दोहराया गया। नतीजतन फिल्म खिंच गई।
मैंने शुरू में मौलिकता के लिहाज से महत्वाकांक्षी न होने की बात इसलिए भी कही क्योंकि ‘साड्डी लव स्टोरी’ हमने पहली बार नहीं देखी है। हालांकि धीरज रतन कुशल कथाकार हैं। ‘वाइटबोर्ड’ और ‘साल्वेशन’ में छिपे अनेक विमर्श (करप्शन, कोलाहल, नैराश्य, जीवन, मृत्यु) और दर्शन यूं ही नहीं आ गए होंगे। व्यावसायिक प्रारूप की शर्तें बहुत कुछ बदल देती हैं। पंजाबी सिनेमा अभी अपने बदले रूप में शुरू हुआ ही है। मल्टीप्लेक्स और वेस्ट से जुड़ाव का पूरा फायदा इसे मिल रहा है। संगीत और गायक इसका मजबूत पक्ष हैं, निर्देशक परिपक्व हो रहे हैं। कुछ वक्त बाद मनोरंजन के लिहाज से ये शायद देश का सबसे हैरान करना वाला क्षेत्रीय सिनेमा होगा।

(‘Saadi Love Story’ is a Punjabi feature film directed by debutant Dheeraj Rattan. He’s been a writer (Screenplay and dialogues) for many successful Punjabi movies, like, ‘Jatt and Juliet’, ‘Dharti’, ‘Jihne Mera Dil Luteya’ and ‘Mel Karade Rabba’. Before that he wrote a few Hindi movies. So, this movie is about two boys, both Rajveers (Amrinder Gill and Diljit Dosanjh), claiming that they are the true love of Gurleen (Neetu Singh), a girl lying in coma. Now the family (played by Surveen Chawla, Kulbhushan Kharbanda, Dolly Ahluwalia, Navneet Nishan) awaits for Gurleen to awake and tell the truth. In the meantime, the boys are busy telling their version of love story to the ever curious Preeti and family. ‘Saadi Love Story’ released on January 11, 2013.)
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